Saturday, January 29, 2011

" स्वयं से पूछेँ " ?

" स्वयं से पूछेँ " ?
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नारायण । अमेरिका मेँ ऑपेन हायमर नाम के एक बड़े वैज्ञानिक थे । अब वे संसार मेँ नही रहे । वे अपने साथ जर्मनी का एक बड़ा बुड्ढा अध्यापक रखते थे जो गणित - शास्त्री था । नारायण । नाम था उसका " षुट्ज " । ऑपेन हायमर कोई भी सिद्धान्त बनाते थे तो उसे सामने बैठाकर सुनाते थे ! कई लोग ऑपेन हायमर से पूछते थे " तुम्हारी बात इनकी समझ मेँ आती होगी ? " ऑपेन हायमन कहते थे " इन्हे गणित बहुत आता है । मैँ कोई भी सिद्धान्त बनाता हूँ , तो वह गणित की दृष्टि से ठीक है या गलत , इसे जानने के लिये इन्हे सुनता हूँ और ये समझकर तुरंत जबाब दे देते हैँ । " ऑपेन हायमन से उनके एक वैज्ञानिक मित्र ने कहा - " यह जमाना ऑटोमेटान का है , ऐसी मशीन आति हैँ जो गणित का सवाल तुरंत हल कर देती हैँ । इस जमाने मेँ अपने साथ इस बुड्ढे - खूसट को क्योँ रख छोड़ा है ? मशीन से जबाब लिया करो । हायमर को यह जच गई कि इन बेचारोँ को क्योँ तकलीफ देँ । क्योँकि कई बार समय - बे समय इन्हे बैठाकर पूछना पड़ता था और वे 90 नब्बे वर्ष के थे । हायमन ने मशीन रख ली । अपना एक सिद्धान्त मशीन को सुनाया तो उसका जबाब आया कि तुम्हारा " सिद्धान्त गलत है ।" दुसरे ही दिन सबेरे " षुट्ज से कहा कि " आज बड़ी गड़बड़ी हो गई । एक सबाल किया लेकिन गलत निकल आया ।" षुट्ज को पहले ही अनुभव था कि इसका प्रातिभ ज्ञान कभी गलत होने वाला नही है । उसने कहा , " सुना । " सुनाया तो षुट्ज उसी समय कहने लगा " तेरा सिद्धान्त ठीक है ।" हायमर को विश्वास था कि षुट्ज ने कह दिया तो गलती नहीँ हो सकती । नारायण , चार आदमी बैठकर उस हिसाब को छह महिने मेँ पूरा कर पाये । जब पूरा हुआ तो पता लगा कि मशीन ने गलती की थी । नारायण , हमलोगोँ को संस्कार बैठा दिया गया है कि यन्त्र से आने वाला जबाब सही होता है । लेकिन हायमर ने उस दिन से कान पकड़ लिया कि " मशीन को अब अपना सिद्धान्त नही सुनाऊँगा । " मशीन गलती कर सकती है लेकिन जिसने " गुर " का अभ्यास किया है , उसके दिमाग से गलत जबाब नही आयेगा । मशीन का कोई खटका खराब हो जाये तो सारे जबाब गलत ही आते रहेँगे , जब तक " चेतन " मिलान करके न देखे तब तक पता ही नही चलेगा कि गलती होती चली जा रही है । योँ यंत्र गलती कर सकता है लेकिन जिसने " गुर " याद कर रखा है , वह चेतन गलती नही खायेगा ।
ऐसे ही हमारे मन , बुद्धि मशीन हैँ । सिर्फ मन , बुद्धि के भरोसे रहने पर जबाब गलत निकल सकता है । लेकिन यदि आपने अभ्यास पक्का कर रखा है तो आपका आनन्दरूपता का जबाब तुरंत आ जायेगा । यंत्र गलत बता सकता है लेकिन जिनने अभ्यास से अपने को पुष्ट कर लिया है वह गलत नहीँ बता सकता । इसी प्रकार हर परिस्थिति के अन्दर यदि अभ्यास किया है कि किस प्रकार अपने स्वरूप आनन्द मेँ पहुँचे तब चाहे किसी प्रकार के राग , द्वेष आदि का सवाल आये , तुरन्त अपने स्वरूप मेँ आनन्दरूप मेँ पहुँच जायेँगे । जैसे राजा के लिये उसके राज्य मेँ रहने वाली प्रजा है , इसी प्रकार आपके - हमारे शरीर मेँ रहने वाली " कर्मेन्द्रियाँ , ज्ञानेन्द्रयाँ , अन्तःकरण - ये सारे आपके - हमारे प्रजा हैँ , मन मेँ उत्पन्न होने वाली जितनी वृत्तियाँ हैँ , वे मन की प्रजा हैँ । क्या कारण है कि आज घर - घर मेँ राग , द्वेष . काम , क्रोध छोटी - छोटी बातोँ पर लोभ , मोह बढ़ता जा रहा है । क्योँकि हमारा राजा इन सब दोषोँ से भरा है । जब राज्य करने वाले मेँ ये भरेँ हैँ तब प्रजा मेँ आने ही हुए । यह वही देश है : यहाँ एक ब्राह्मण का जवान मर गया था । वह ब्राह्मण उसे लाकर श्री भगवान रामचन्द्र जी के दरबाजे पर ले गया । कहा - " तुम्हारा राज्य अधर्म का राज्य है । मेरा जबान लड़का क्योँ मर गया ? " " निज पुत्रोँ का श्राद्ध पिता रो - रो कर करता है , हे जगदीश्वर तुम्हारी क्या यही ईश्वरता है ! " भगवान श्री राम ने पता लगाया कि किस अपराध के कारण ब्राह्मण का जबान लड़का मर गया । उनका निश्चय था क्योँकि " मेरी प्रजा को दुःख हुआ तो जिम्मेवारी मेरी है ।" आज उसी देश मेँ हजारोँ आदमियोँ को मार ड़ालेँ , उनका सामान फेँक देँ तो भी राजा कहता है " मेरा कोई कसूर नही है , कसूर तुम लोगोँ का है । उसे यह साहस नही है कि पता लगाऊँ किस अधर्म के कारण ऐसा हुआ है । जैसे राज्य मेँ ऐसे ही घर मेँ पिता छाती पर हाँथ रखकर नहीँ कहता कि " लड़के को मैँने बिगाड़ा है । " कहता है " आजकल के लड़के बिगड़ गये हैँ ।" राजा को यह कहने की हिम्मत होनी चाहिये कि मेरी प्रजा के अन्दर जितनी खराबियाँ आ रही है , वे मेरी हैँ । घर के अन्दर बड़े को यह अभिमान होना चाहिये कि मैने लड़के को ठीक नही रखा तब वह बिगड़ गया । दूसरे पर जिम्मेवारी डालना बेकार है । इसी प्रकार सारे शरीर मेँ यह अभिमान होना चाहिये , " मन मेँ गलत वृति आई है तो मेरी गलती से आई है । ऐसा बहाना न बनायेँ की पूराने जमाने के संस्कार उदय हो गये होँगे या किसी को देख कर ऐसी वृत्ति आ गई होगी ।
नारायण । आज जोधपुर ( राजस्थान ) मेँ जहर मिला शराब पी कर कितने गरीब मर रहे है मुख्यमंत्री मरने बाले लोगोँ को लाख - लाख रुपये सहायता राशी बाँट रहे हैँ और हाँथ उठवा - कर पीनेवालोँ से संकल्प करवा रहे हैँ कि शराब नही पीयेँगे । दूसरी तरफ उन्ही के कारीन्दे मंत्री तो साथ - साथ चल रहे हैँ वे कहते है कि सरकारी दूकान से खरीद कर पीओ । आज हमारी मनसा ऐसी हो गई है कि हजार- पाँच सौ रुपयोँ के लिये किसी की हत्या कर देते हैं तो अगर लाख - पाँच लाख रुपया सरकार से मरने के बाद मुआबजा मिल जाये तो ऐसे बहुत दुष्ट प्रकृति के लोग हैँ जो अपने ही घर मेँ रुपयोँ की लालच मेँ या सरकारी नौकरी पाने के लिये अपने घर के सदस्य की हत्या कर देँगे । विहार मेँ एक शिक्षक के पुत्र ने अभी रिटायर नही हुये पीता की हत्या करके सानत्वना रूप मेँ नौकरी पा लीया । यह सरकारी मुआबजा का राजनितिक खेल बन्द होना चाहिये । आज भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वर्तमान सरकार से यह मांग कर रहे हैँ कि जो जहर मिले शराब पीने जो मरे है उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दो । क्या इस देश मेँ ऐसा ही खेल होता रहेगा ?हम दूसरोँ पर जिम्मेदारी ड़ालते रहेँगे और खुद अपने मन ,बुद्धि , इन्द्रयोँ पर नियन्त्रण नही रखेँगे तो हमारा अस्तित्व समाप्त हो जायेगा ।
 नारायण हरिः ।।

" श्री भगवन्नाम जपयज्ञ " ?

                        " श्री भगवन्नाम जपयज्ञ " ?                                                                               श्री गीता जी मेँ श्रीभगवान् ने - " जपयज्ञ " को अपनी " विभूति " बताया है " यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि " इस यज्ञ का द्रव्य क्या है ? वाणी के द्वारा उच्चारण किया जाने वाला " मंत्र " या कोई उन श्री सच्चिदानन्द का नाम । जीसे आपने जान लिया है ,मान लिया है । नारायण । कहने को लोग बड़ी सरलता से कहते हैँ कि " हम तो जप यज्ञ कर रहेँ है , यानी उस श्री सच्चिदानन्द जी नामजप कर रहे हैँ , मंत्र का जप कर रहे हैँ । नारायण , पर यह इतना सरल नहीँ है , बड़ा टेढ़ा है मामला है क्योँकि यज्ञ के अन्दर जो सामग्री ड़ालेँगे , वह शुद्ध होनी चाहिये । कीड़ा खाये हुए गेँहूँ से तो यज्ञ होने वाला नही है । जिस तिल का तेल निकल चुका है , उस बचे हुए खली से भी यज्ञ नही होना है और जो चावल सड़ चुका है , उससे भी यज्ञ होने वाला नही है । यज्ञ होने के लिये द्रव्य शुद्ध होना चाहिये । अगर " जपयज्ञ " करते हैँ तो पहले विचार करना पड़ेगा कि वाणी मेँ कोई अशुद्धि तो नही है । वाणी की सबसे बड़ी अशुद्धि झूठ बोलना है । इसलिय हमारे मंत्रद्रष्टा पुराणकारोँ ने कहा कि " कलियुग " मेँ रहने वालोँ को मंत्रसिद्धि क्योँ नही होती ? उसमेँ कारण ही बताया " असत्यवदन " ( असत्य बोलने ) के द्वारा वाणी दग्ध हो गई है । जैसे जला हुआ पदार्थ यज्ञ के काम का नहीँ है , इसी प्रकार जो वाणी झूठ बोलती है , उससे क्या " जपयज्ञ " हो सकेगा ! ऐसे ही दूसरे की निन्दा करना भी वाणी का दोष है ।जो व्यक्ति अपनी वाणी से किसी दूसरे की निन्दा करता है , क्या वह " जपयज्ञ " कर सकेगा ? इसलिये " द्रव्ययाग " करना सरल है , " जपयज्ञ " करना कठीन है । योँ कहने को लोग बड़ी जल्दी कह देते हैँ कि " हम जपयज्ञ करेँगे । " अच्छे चावलोँ को बीनना सरल है , धी बढ़िया खरीद कर लाना सरल है , तिलोँ को भी अच्छा चुनकर लाना सरल है , लेकिन वाणी को शुद्ध रखना बड़ा कठीन है । नारायण । सम्पूर्ण जीवन मेँ भी अगर उस प्रभु के नाम का , मंत्र का एक माला भी हो तो जीवन सफल ।
लेकिन बड़ा कठीन है ।                                                                                             श्री नारायण हरिः ।।
" राजा रघु "
नारायण । श्री
एक बार राजा रघु ऐसा ही सर्वमेध यज्ञ कर चुके थे । दान करते
नारायण
राजा रघु कहले लगे
जैसे ही रधु का निर्णय हुआ
नारायण । अन्तमेँ आकर ऋषियोँ ने बीच
नारायण । इस कथा के द्वारा कुछ सूक्ष्म बात भी बता भी जान लेँ ।
हमारे यहाँ
"
कपालं चेतीयत्तव वरद तंत्रोपकरणम् ।।
" रघु " बड़े प्रतापी राजा हुए । वे इतने प्रतापी थे कि उन्ही के नाम से उनका " वंश " ही चल गया जिसे " रघुवंश " कहा जाता है । जो सर्व विदित है । साक्षात् श्री सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्री विष्णु यद्यपि उनके कुल मेँ उत्पन्न हुए , लेकिन फिर भी वह रामवंश नही कहा गया । उलटा राम का ही नाम रघु से पड़ा , रघु से उत्पन्न राघव , रघुकुलोद्भव , रधुनाथ , राघवेन्द्र , रघुवंशी नाम पड़े । यह राजा रघु की कितनी बड़ी महत्ता बताता है । रघु बड़े दानी थे । आजकल के राजा की तरह ( वर्तमान सरकारोँ ) नहीँ थे । आजकल के राजा का दान तो आप जानते ही हैँ । अगर तीन सौ बीस करोड़ रुपया आप लोगोँ से टैक्स लिया । उनमेँ से दो सौ अस्सी करोड़ रुपया उनके कर्मचारियोँ पर खर्च होता है अर्थात् वह रुपया खुद उन पर ही खर्च होता है जो टैक्स लेते हैँ । बाकी से कुछ सड़के इत्यादि बना दी गई । कहते हैँ कि " प्रजा ( जनता ) का कल्याण कर रहे हैँ " , नारायण , नाम हो रखा है " बैलफेयर स्टेट " ," जनकल्याण मन्त्रालय " अर्थात् जनता का कल्याण करने बाला राज्य , जनता का कल्याण करने बाला महकमा । आपके जितनी बरसोँ की कमाई विद्यमान हैँ , उस सबको लेना अर्थात जो कुछ जनता की सम्पति है उसे " चूँकि हम तुम्हारे उपर राज्य करते हैँ , इसलिये " लूट लेना - इसी का नाम " वेलफेयर " रखा है । लेकिन रघु प्राचीन हिन्दू राजा थे और जनता का कल्याण करते थे । जनकल्याण का अर्थ उन्होँने " जनता से राजा का कल्याण " ऐसा नही समझ रखा था ! जनता का कल्याण हो , उसे वे जनकल्याण मानते थे । आज जनता से जो अपना ज्यादा से ज्यादा कल्याण कर ले , वह उतना ही बड़ा " नेता " हो जाता है । नारायण , राजा रघु ऐसे नही थे , उनका दृष्टिकोण था कि हम अधिक से अधिक जनता का कल्याण करेँ । इसलिये वे बीच - बीच मेँ " सर्वमेध यज्ञ " करते थे जिसमेँ जितनी अपनी सम्पत्ति होती थी , सब दान कर देते थे । दूसरे राज्योँ पर चढ़ाई करके वहाँ से धन लाते थे , यही राजा का उस समय कार्य था , उसी धन के द्वारा " सर्वमेध यज्ञ " करके उसमेँ वह सम्पत्ति सबको बाँट देते थे ।- करते अपने पूजा के बर्तन और अपने सारे वस्त्र भी दान कर दिये थे । नारायण , यह कोई अतिशयोक्ति नही है । नारायण , श्री राजा रघु की बात जाने देँ , आज से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व होने होने वाले राजा " हर्ष " के बारे मेँ " फाहियान " और " इत्सिंग " लिखते हैँ कि वह हर " कुम्म के मेले मेँ " जाकर अपना सारा खजाना दान कर देता था और अपने वस्त्र तक दान कर के अपनी बहन से वस्त्र का एक खण्ड मांगकर उसे पहन कर वापिस जाता था । हर्ष कान्यकुब्ज नरेश था । जिसने यह देखा , वह राजा रघु के दान पर आश्चर्य नही करेगा । आज कहते हैँ " अपनी बड़ी से बड़ी चीज दान कर दी " फिर भी महलोँ मेँ उनके राग - रंग मेँ कोई फर्क नही पड़ता । यदि बम्बई , दिल्ली या अन्य कहीँ उनके दल का सम्मेलन हो रहा है तो बड़े से बड़े सिनेमा एक्टर और एक्ट्रेसेस को बुलाकर राग - रंग , नाच - गान मेँ करोड़ो रुपया खर्च हो जायेगा और खर्च होने के बाद , जनता को कहेँगे - " अपना - अपना पेट बाँध लेना चाहिये क्योँकि राष्ट्र पर आपत्ति है ! " आज के लोग इसी को जनकल्याण कहते हैँ । राजा रघु ने भी अपना सर्वस्व , बर्तन और वस्त्र तक दान कर दिये । संध्या - वन्दन करने के लिये एक मिट्टी का कुल्हड़ लेकर बैठे थे । नारायण । श्री राजा रघु संध्या - वन्दन करने के लिये केवल एक मिट्टी का कुल्हड़ लेकर बैठे थे । उसी समय एक ब्राह्मण सनातक वहाँ आया । विद्या अध्यन करने के बाद विवाह करने के पूर्व व्यक्ति को " स्नातक " कहते हैँ । उसने आकर राजा को आर्शीवाद दिया । राजा को उपर से निचे देखा और आर्शीवाद दे कर ही चलने लगा । उस स्नातक ब्राह्मण का नाम " कोत्स " था । नारायण , उसे वापिस जाते देख रघु ने पुछा " कोत्स ! किस मतलब से आये थे ? " स्नातक ब्राह्मण कौत्स ने कहा - " किसी मतलब से आया था लेकिन आपको देखकर समझ आ गया कि आपसे मेरा मतलब पूरा होने का नही है । इसलिये वापिस जा रहा हूँ । नारायण , शास्त्रोँ मेँ स्नातक को बड़ा पूज्य माना गया है । नारायण , उस ब्राह्मण स्नातक को राजा रघु हाँथ जोड़ कर कहने लगे " यह तो ठीक नहीँ है कि आप मेरे पास किसी मतलब से आये होँ और मैँ पूरा न कर सकूँ , आप ऐसे हीँ चले जाओ । बताइये तो सही कि बात क्या है ? ब्राह्मण स्नातक कौत्स ने कहा - " जाने दो , राजन् ! आपको सुनकर दुःख होगा । जब रघु ने बार - बार आग्रह किया तब ब्राह्मण स्नातक कौत्स ने कहा - " राजन् ! इसी आग्रह के चक्कर मेँ मैँ फँसा और आप भी फँसोगे , इसलिये हे राजन् । मुझे जाने दो । राजा रघु ने जिद पकड़ ली और कहा " अब तो बता दो हे ब्राह्मण देवता ।, कोत्स ने कहा - " मेरे पिता बड़े गरीब ब्राह्मण हैँ । मुझे गुरु जी के पास पढ़ने के लिये भेज दिया था । अध्ययन समाप्त हो गया । गुरु जी ने कहा तू पढ़ - लिख गया , अब तेरा " स्नातक संस्कार " करते हैँ । बहाँ बाकी राजघरानोँ के भी बच्चे भी थे । नारायण , प्राचीनकाल मेँ राजा और गरीब के बच्चे एक साथ पढते थे । एक साथ भिक्षावृति करते हुये विद्याध्यन करते थे । तब तक समाजवाद का जमाना नही जहाँ प्रधानमंत्री के लड़के आक्सपोर्ट मेँ और आपके लड़के म्युनिस्पैलिटी स्कूल मेँ और मध्यम वर्ग के कान्वेन्ट मेँ पढ़ेँ क्योँकि हम सब समान है । नारायण , यह समाजवाद तब तक नही आया था । अध्यन समाप्त होने पर गुरु ने स्नातक संस्कार कराया । तब फीस होती नही थी । अध्ययन के बाद जिसकी जो सामर्थ्य हो , जिसकी जो इच्छा हो , वह गुरु को देता था । किसी ने बहुत धन दिया , किसी ने थोड़ा दिया , गुरु सामर्थ्य के अनुसार लेते चले गये । मैने गुरु जी से कहा " मै क्या लाऊँ ? तो उन्हे पता था कि मैँ गरीब ब्राह्मण का पुत्र हूँ । कहने लगे जाने दे ! तूने मेरी इतनी सेवा की है , यह क्या कोई कम है । फिर तू ब्राह्मण है , तूझसे क्या लूंगा ? राजन् ! मेरे अन्दर बचपना था । गुरु जी से बार - बार कहा कि " कुछ तो लेलेँ भगवन् । जब मैने इस तरह चार - पाँच बार कहा तो उन्हेँ क्रोध आ गया और कहा - बड़ी दक्षिणा की बात करता है ! मैने तुझे " चोदह विद्याये " पढ़ाई है । जा , चौदह करोड़ सोने की मुद्राये ले आ ! राजन् । मेरा मुँह छोटा हो गया कि यहाँ तो चौदह सौ ताँवे की मुद्रायेँ लाने की सामर्थ्य नही है , फिर सोने की तो बात ही क्या ? मैँ बहाँ से चला । विचार किया कि राजा रघु से ले कर आऊँगा और गुरु जी को देकर उऋण हो जाऊँगा । घर - घर सुना था कि रघु सर्वमेघ याग कर रहे हैँ । मुझे आशा थी कि मुझे भी चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्रायेँ मिल जायेगी । यहाँ आकर देखा कि आप सर्वस्व दान कर चुके हो । अपना ही बर्तन आपका गायब है एक मिट्टी का कुल्हड़ रख लिया है आतने ।- " स्नातक मेरे द्वार पर आया और लौट जाये , यह नही हो सकता । स्वर्ण मुद्रायेँ दूँगा लेकिन मुझे दो - चार दिन का समय देवेँ ब्राह्मण कुमार । और तब तक आप अतिथिशाला मेँ ठहरेँ , खाने - पीने की सारी व्यवस्था वहाँ है । मैँ कुछ न कुछ इन्तजाम करूँगा , ऐसे नही लौटने दूँगा । कौत्स ने बहुत कहा कि मेरे मन मेँ कोई विकार नहीँ क्योकि आपके पास होता और आप ना करते तो कोई बात थी , लेकिन आपके पास तो है नहीँ । इसलिये मन मेँ कोई बुरा भाव न समझेँ । रधु ने विनती की आप कुछ दिन यहाँ निवास करो । आप चले जायेँगे तो मुझे परम दुःख होगा । कौत्स के मन मेँ बड़ा संकोच हुआ , फिर भी वहीँ ठहर गया । रघु विचार करने लगे कि क्या किया जाये , क्योँकि सर्वस्व दान हो चूका है । नारायण , वह सर्वस्व दान नकली नहीँ हुआ करता था । जितना भी धन कोष मेँ हुआ करता था और जितना भी धन दूसरे लोगोँ से लेना होता था , वह पहले ही ले लिया जाता था । अपने अन्तर्गत दूसरे जितने भी राजा हो सकते थे , उन सबसे ले लेते थे । अतः प्रजा से भी अब कुछ नहीँ लिया जा सकता । अब जबरदस्ती लेना अत्याचार होता । शास्त्र मेँ राजा का छठ्ठा भाग निश्चित किया है । इससे ज्यादा जो लेता है , वह पाप है । जनता से कुछ नहीँ लेना है । इस प्रकार विचार करते - निर्णय किया गया कि इस पृथ्वी मेँ तो अब कही से सम्भावना नहीँ है । देवलोक पर चढ़ाई करके कुवेर को जीतकर कुछ धन लाया जाये । नारायण , यह उस समय राजा की दृष्टि थी । यह राजा नहीँ कि खर्चा बढ़ गया है तो जनता को और चूसो । अरे ! राजा हो , कोई और साधन सोचो ।, वैसे ही आज्ञा हो गई कि " सवेरे ही शस्त्र और रथ तैयार रखना । देवलोक पर चढ़ाई करके वहीँ से कुछ धन लाया जायेगा । उनके रथ सूर्यलोक , स्वर्गलोक तक जाया करते थे । " रघुवंश " मे लिखा है " आनाकरथवत्मानां " उनके रथ इतने प्रतापी थे । यक्षराज धनाध्यक्ष कुवेर को पता लगा तो उसे शर्म आई कि जिसकी ऐसी वृति है कि अपना सर्वस्व दान कर दिया है , वह ब्राह्मण स्नातक के लिये चलकर मेरे पास आये यह शोभा नही देता । इसलिये कुवेर ने उसी समय वहाँ स्वर्ण - वृष्टि कर दी क्योँकि श्री रघु अपने लिये नहीँ वल्कि ब्राह्मण स्नातक गुरुजी को दक्षिणा दे सके इस प्रयोजन से धन चाहते थे । राजा रघु प्रातःकाल ब्राह्म मुहूर्त मेँ उठकर स्नान , ध्यान करके बाहर आये तो देखा कि सारा आंगन स्वर्ण से भरा है ! यह देख कर श्री रघु देवताओँ की प्रार्थना करने लगे । जैसे ही प्रातःकाल का प्रकाश हुआ , ब्राह्मण स्नातक कौत्स को बुलाया और उन स्वर्ण मुद्राओँ को दिखा कर कहा कि " ले जाओ । " ब्राह्मण स्नातक ने कहा " मुझे तो चौदह करोड़ ही चाहिये , बाकी नही लूँगा । " लेकिन कुबेर वृष्टि करने लगेँ तो फिर क्या कहना है ! वहाँ से वृष्टि होगी तो गिनकर तो होगी नही । जैसे वर्तमान सरकारे आपको पानी देते हैँ तो पानी के साथ एक मीटर ( पानी मापक यन्त्र ) लगा देते हैँ कि इतने गैलन पानी इतने पैसे लेँगे । नारायण , पानी तक बेचते हैँ । जलदाय विभाग खोल रखा है । नारायण , मैने सुना है पहले - पहल राजस्थान के अन्दर " जोधपुर " मेँ जब पानी देने का यन्त्र तो उस समय जोधपुर के राजा " महाराजा उम्मेद सिंह जी थे । उनसे लोगोँ ने कहा कि " सबको पानी मिलेगा , इसकी व्यवस्था के लिये मीटर ( पानी मापक यन्त्र ) भी आये हैँ । " महाराजा श्री उम्मेद जी बोले " इससे क्या होगा ? " घरोँ मेँ मीटर लगाये जायेँगे उससे पानी का दाम लगेगा । महाराजा श्री उम्मेद सिँह जी ने कहा - " क्या मुझे भिश्ती बनाओगे ? " मैँ तो राजा हूँ । क्या पानी के पैसे लूँगा । जब पानी बरसता है तब " इन्द्रदेव " मीटर नही लगाता , कितना सड़कोँ मेँ बह गया , कहाँ - कहाँ बहा कोई रुकावट नही । इसी प्रकार स्वर्ण -वृष्टि हुई तो गिनती करके नारायण , थोड़े ही होगी । जब उन स्वर्ण मुद्राओँ को गिना गया तो चौदह करोड़ से कई गुना माल था । ब्राह्मण स्नातक कोत्स ने उनमेँ से चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्रायेँ ले लीँ । राजा श्री रघु ने ब्राह्मण स्नातक कौत्स से कहा- " तुम्हारे निमित्त आया धन मैँ रख लूँ , यह नही हो सकता । आजकल के राजा मेँ क्या यह भाव है ? आज कल जिस निमित्त पैसा आया और पुरा खर्च नही होता किसी कारण तो वह पैसा " लेप्स " हो जाता है । यह लेप्स पैसोँ का क्या होता है , ईश्वर जाने । राजा रधु ऐसे नही थे । वे श्री कौत्स से कहते हैँ तेरे निमित्त ये स्वर्ण मुद्राये आई है तू ले जा । कौत्स ने कहा मैँ तो चौदह करोड़ ही श्री गुरु जी को दक्षिणा देने के लिये लूगाँ । इससे ज्यादा मैँ नही लूंगा । अगर दो चार ज्यादा हो तो ले लेता । मैँ इतना बड़ा दुःख का पहाड़ नही लूँगा । नारायण , बाकी न रघु रखने को को तैयार हो रहे थे और न कौत्स । दोनोँ मेँ बड़ा झगड़ा हुआ । एक कहे तू ले जा दूसरा कहे तू रख ले । नारायण , वाद - विवाद बढ़ गया ।- बचाव किया । ऋषियोँ ने कहा - इस धन को ले जा कर हिमालय मेँ गाड़ दो । ब्राह्मण के निमित्त का धन राजा रखे , यह ठीक नही और बिना मतलब धन एकत्र करके ब्राह्मण बुद्धि भ्रष्ट करे , यह भी ठीक नहीँ । इसलिये इसे गाड़ दो ताकि यह किसी को दुःख न दे । नारायण , वही धन " द्वापर " ओर " कलि की संघि मेँ " युद्धिष्ठिर बहाँ से निकालकर लाये थे । भगवान व्यास को पता था कि इस प्रकार सारा धन गाड़ दिया गया था । चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्रायेँ कौत्स ने लाकर गुरुजी को दे दिये । कार्य पूरा हो गया । यह राजा रघु की कथा है ।" लघु " शब्द मेँ " " की जगह " " उच्चारण भी मान्य है । इसलिये लधु , रघु दोनोँ का अर्थ एक ही है । वह परब्रह्म परमात्मा ही अपने " लघुभाव " को अर्थात परिच्छिन्नभाव को प्राप्त हुआ है , तब उसे " रघु " कहते हैँ । जब परिच्छिन्नभाव को प्राप्त हो तभी उसे राजा अर्थात् ईश्वर कहेँगे । समष्टि और व्यष्टि मेँ व्यष्टि की अपेक्षा तो समष्टि व्यापक है , लेकिन उस अखण्ड चिन्नमात्र की अनन्तता की अपेक्षा तो वह भी परिच्छिन्न ही है । कारण उपाधि भी उपाधि तो ही है । वह रघु सर्वस्व दान करता है । ईश्वर जीव को सब कुछ देता है , अपने लिये कुछ नही रखता । इस लिये तो वह ईश्वर है । नारायण , रोज श्री शिवमहिम्न का पाठ करते है उसमेँ कहते हैँ -महोक्षः खट्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः ।"
बुड्ढ़ा बैल
"
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ।।
, बर्तन की जगह मनुष्योँ की कपाल , लगाने के लिये चिता की भस्म । शिव ने अपने लिये ढ़ंग का कुछ भी नही रखा , फिर भी -सुरास्तां ताम् ऋद्धिं विदधति भवद्भ्रूप्रणिहिताम् ।"
अपने पास कुछ न होते हुए भी सारे ही देवताओँ को ऋद्धियाँ भी वही श्री साम्ब सदाशिव देते हैँ । जिसके पास कुछ नही है वही दे सकता है
उसके पास कौत्स चौदह करोड़ मुद्रायेँ लेने आता है । कौत्स का मतलब है कुछ फेँकना । कौत्स ने भी तो एक तरह से फेँका ही था
"
तथापि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमसि ।।
! जिसको अपने आत्माराम की प्राप्ति हो गई है उसे इस विषयोँ की मृगतृष्णा लोभ मेँ नही ड़ाल सकती । दे वही सकता है जो अपने भोग के लिये नही रखना चाहता । जिसे अपने भोग के लिये चाहिये , नारायण , उसकी समस्या है कि " क्या बतायेँ , महँगाई के जमाने मेँ अपना ही खर्चा पूरा नही पड़ता । खर्जा कभी पूरा नही पड़ना है , चाहे दस लाख कमा लेँ । वह बेचारा कहाँ से देगा , जो खुद ही विषय - मृगतृष्णा मेँ फँसा है । राजा रघु , ईश्वर , सर्वस्व दान कर देता है । यहाँ तक की बर्तन और वस्त्र तक दान कर देता है । केवल मिट्टी का एक कुल्लहड़ लिये हुये बैठा है । , बार - बार गुरु जी को यह कह कर कि " कुछ मांग लो ।" जो जीव अपने गुरु को अर्पण करने के लिये चौदह करोड़ स्वर्ण मुद्राये चाहता है , वह ईश्वर के पास पहुँचता है । इन चौदह चीजोँ की ही अनंत वृतियाँ हैँ - पाँच कर्मेन्द्रिया , पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ , और अन्तःकरण - चतुष्टय ( मन , बुद्धि , चित्त और अहंकार ) । इन चौदह की अनंत वृतियाँ है । वे अनंत वृतियाँ सारी स्वर्ण होँ , स्वर्ण वाली हो अर्थात शुभ ही होँ । हम सब रोज प्रार्थना करते हैँ " भद्रं कर्णेभिः श्रृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः " कान की वृति भद्र होँ , आख की वृति भद्र होँ , कल्याण करने वाली होँ । ये सभी वृतियाँ स्वर्णवत् शुद्ध होँ । मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार सब उसी ईश्वर को विषय करेँ , उससे भिन्न किसी को विषय न करेँ । जीव ईश्वर के पास माँगने पहूँचता है क्योँकि और कौन देगा ? जब पहुँचता है तब कहता है -अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं ।"
जब पास पहुँचा तो यहाँ अमंगल दिखा
, कपड़ा - लत्ता भी नहीँ । भगवान ने चिन्ता मत कर , " मंगलमसि " , यह भगवान का नाम है । जिसने सारी भद्रवृतियोँ को ईश्वर से माँग लिया । उसका जीवन धन्य है । नारायण । आप सबको अनंत भद्रवृतियोँ की प्राप्ती हो भगवान श्री भूतभावन से प्रार्थना करता हूँ ।
*
श्री नारायण हरिः ।।