Friday, June 29, 2012



धार्मिक शिक्षा प्रश्नोत्तरी { १ }  क्रमशः ......
* ईश्वर क्या है ?
ईश्वर अखिल ब्रह्माण्डनायक सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा एवं सर्व शक्तिमान् है ।
* वेद किसे कहते हैं ?
॰ अनादि अनन्त अपौरुषेय नियतानुपर्वी वह शब्दराशि जिससे धर्म - अर्थ - काम - मोक्ष पुरुषार्थ चतुष्टय जाने जाते हैं , उसे वेद कहते हैं ।
॰ इनकी परम्परा सृष्टि के आरम्भ काल से बराबर चली आ रही है ।
॰ गुरुओं के मुख से सुने जाने के कारण इसे श्रुति भी कहते हैँ ।
॰ वेद चार हैं - ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद ।
* शाखा किसे कहते हैं ?
॰ वेद के अंश को ही शाखा कहते हैं एवं संहिताओं के भेद को भी शाखा कहते हैं ।
॰ सभी वेदों की 1.131 शाखा है ।
॰ ऋग्वेद की 21 शाखाएँ है ।
आश्वालायनी , शांखायनी , शाकला , वाष्कला , माण्डुकेया प्रभृति हैं । इस समय भारतवर्ष में उत्तरी भारत में शाकला शाखा एवं दक्षिण भारत में वाष्कला शाखा की संहितायें मिलती है शेष लुप्त हैं ।
* यजुर्वेद की कितनी शाखायें हैं ?
॰ यजुर्वेद की 101 शाखाएँ हैं । उनमें 6 शाखाएँ मिलती हैं जिनके नाम हैं - तैत्तिरीय , मैत्रायणि , कठ , कापिष्ठल , श्वेताश्वतर ये कृष्ण यजुर्वेद की शाखाएँ  हैं जो उपलब्ध हैं ।
॰ शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेय , काण्व शाखाएँ उपलब्ध हैं शेष शाखाएँ लुप्त है ।
* सामवेद की कितनी शाखाएँ है ?
॰ सामवेद की 1000 एक हजार शाखाएँ हैं । जिनमें केवल 3 तीन शाखाएँ प्राप्त हैं शेष शाखाएँ लुप्त हैं ।
* अथर्ववेद की कितनी शाखाएँ है ?
॰ अथर्ववेद की 9 नव शाखाएँ हैं । जिनमें पैप्पलाद और शौनकीया प्राप्त हैं ।
* ऋग्वेद की शाकल शाखा का विवरण बतायें ?
॰ ऋग्वेद की शाकल शाखा 10 दस भागों में विभक्त है । जिन्हें मण्डल कहते हैं प्रत्येक मण्डल में कई सूक्त में कई ऋचाएँ हैं । कुल 1 , 028 एक हजार अठ्ठाईस सूक्त हैं । जिसमें 10 हजार 500 पाँच सौ ऋचाएँ है ।
* यजुर्वेद का विवरण बतायें ?
॰ यजुर्वेद 2 दो भागों में विभक्त हैं शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद । शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयमाध्यदिन संहिता में कुल 40 चालीस अध्याय हैं जिनमें यज्ञ संबन्धी ज्ञान का विस्तृत विवरण है ।
* कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीयशाखा में कितने मन्त्र हैं ?
॰ कृष्ण यजुर्वेद में 7 सात अष्टक , 44 चौवालीस प्रपाठक , 651 छः सौ एक्यावन अनुवाक और 2,198 दो हजार एक सौ अठ्ठावन मन्त्र समुह है ।
* शुक्ल यजुर्वेद माध्यदिन शाखा में कितने मन्त्रादि हैं ?
॰ शुक्ल यजुर्वेद माध्यदिन शाखा में 40 चालीस अध्याय 1 ,975 एक हजार नव सौ पचहत्तर मन्त्र तथा 90 , 535 नब्बे हजार पाँच सौ पैतीस अक्षर 1 , 230 एक हजार दो सौ तीस सभी प्रकार के { - } धूं चिह्न हैं ।
* सामवेद का विवरण बतायें ?
॰ सामवेद की 1, 000 एक हजार शाखाओं में से कौथुमी शाखा में 29 उनतीस अध्याय हैं , 6 छः आर्चिक 88 अठ्ठासी साम , 1 , 824 एक हजार आठ सौ चौबीस मन्त्र हैं ।
राणायणी शाखा में 1 , 549 एक हजार पाँच सौ उननचास मंत्र हैं ।
* अथर्ववेद के विवरण बतायेँ ?
॰ अथर्ववेद की 9 नव शाखाएँ है जिसमें से शौनक शाखा में 20 बीस काण्ड , 34 चौतीस प्रपाठक , 111 एक सौ ग्यारह अनुवाक , 733 सात सौ तैतीस वर्ग , 759 सात सौ उननचास सुक्त , 5 . 977 पाँच हजार नौ सौ सतहत्तर मन्त्र हैं । कुछ शाखाएँ ऐसी है जिनके आरण्यक , ब्राह्मण उपनिषद ही मिलते हैं मन्त्र भाग नहीं मिलते ।
* ब्राह्मण किसे कहते हैं ?
॰ शतपथ ब्राह्मण , ताड्यमहाब्राह्मण , आर्षेय ब्राह्मण , सामविधान ब्राह्मण आदि आदि ।
* आरण्यक किसे कहते हैं ?
॰ आरण्यक में कहे गये और सुने जाने के कारण इसे आरण्यक कहते हैं । यह भी ब्राह्मण भाग की तरह वेद ही हैं । वानप्रस्थाश्रम के नियत तथा ज्ञान कथा की जिसमें बाहुल्यता है तथा ब्राह्मण भाग होने के कारण वेद ही है ।
* आरण्यक ग्रन्थों के नाम बतायें ?
॰ ऐतरेयारण्यक , कौशितकी आरण्यक , तैत्तिरीय आरण्यक आदि ।
* उपनिषद् किसे कहते हैं ?
॰ ब्रह्म की विवेचना जिसमें हो उसे उपनिषद् कहते है । उपनिषद् प्रायः संहिताओं और ब्राह्मण के अंश मात्र हैं ।
* उपनिषदों के नाम बतायें ?
॰ उपनिषद् अनेकों है यथा वृहदारण्यकोपनिषद् , माण्डुक्योपनिषद् , प्रश्नोपनिषद् , कठोपनिषद् प्रभृति । ये भी सभी वेदों की शाखाओं के पृथक - पृथक हैं ।
* कल्प सूत्र किसे कहते है ?
॰ जिस ग्रन्थ में वैदिक यज्ञादि एवं संस्कारों की विधि तथा प्रयोगों का वर्णन हो उसे ही कल्प सूत्र कहते हैं । जिन वेदों की शाखाएँ नहीं मिलती उनके आरण्यक ब्राह्मण भी नहीं मिलते ।
* कल्प सूत्र के कितने भेद हैं ?
॰ कल्प सूत्र के 4 चार भेद है - श्रौत सूत्र , गृह्य सूत्र , धर्म सूत्र , शुल्व सूत्र ।
* श्रौत सूत्र किसे कहते हैं ?
॰ जिसमें श्रौत यागो का तथा श्रतियों के पठन - पाठन का वर्णन हो उसे श्रौतसूत्र कहते हैं , ये प्रत्येक वेद की शाखाओं के भिन्न - भिन्न हैं । तथा आश्वालायन , श्रौतसूत्रकात्यायन श्रौतसूत्रादि ।
* गृह्य सूत्र किसे कहते हैं ?
॰ गृह्यसूत्र जिसमें षोडस संस्कार { जन्म से लेकर मरण अन्त्येष्टि } का वर्णन हो उसे गृह्यसूत्र कहते हैं। ये सब धर में होते है इसलिये इसे गृह्यसूत्र कहते हैं यथा पारस्कर गृह्यसूत्र , आश्वालयन गृह्यसूत्र । यथा ऋग्वेद की आश्वालयन शाखा का आश्वालयन गृह्यसूत्र , शांखायन गृह्यसूत्र प्रभृति ।  
* धर्मसूत्र किसे कहते हैं ?
॰ जिसमें मानव धर्म के प्रातः काल से शय7 पर्यन्त और जन्म से मृत्यु पर्यन्त कृत्यों की विधियों का वर्णन हो उसको धर्मसूत्र कहते हैं । यथा गौतम धर्मसूत्र ।
* वेदाङ्ग किसको कहते हैं ?
॰ शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , ज्योतिष तथा छन्द ये 6 छः वेद के अङ्ग हैं ।
* वेद के अङ्गों के स्थान बतायें ?
॰ शिक्षा नासिका है , कल्पसूत्र हाथ है , व्याकरण मुख है , निरुक्त कान है , ज्योतिष नेत्र है , छन्द पाँव है ।
* शिक्षा किसे कहते हैं ?
॰ वेद मन्त्रों के उच्चारण के लिये प्रयुक्त होने वाले उदात्त - अनुदात्त - स्वरित स्वरों के नियमों का वर्णन जिसमें हो उसे शिक्षा कहते हैं ।
* कल्प किसे कहते हैं ?
॰ जिसमें वैदिक मंत्रों के ऋषि देवता छन्दों के साथ साथ यज्ञादिक एवं संस्कारों की विधि तथा प्रयोगों का निर्देशन हो उसे कल्प कहते हैं ।
* व्याकरण किसे कहते हैं ?
॰ साध्य , साधन , कर्त्ता , कर्म , क्रिया , समासादि का निरुपण एवं शब्द के व्युत्पादन तथा भाषा के नियमों का वर्णन जिसमें हो उसे व्याकरण कहते हैं ।
* निरुक्त किसे कहते हैं ?
॰ पद निर्वाचन अर्थात् शब्दों के अर्थ करने को प्रणाली का वर्णन जिसमें हो उसे निरुक्त कहते हैं।
* ज्योतिष क्या है ?
॰ जिसमें ग्रह , नक्षत्र उनकी गति एवं काल गणना का वर्णन है वह ज्योतिष है ।
* छन्द किसे कहते हैं ?
॰ लौकिक वैदिक पदों के यति विराम आदि को व्यवस्थित करने का वर्णन जिसमें हो उसे छन्द कहते हैं । छन्द दो प्रकार के होते हैं । लौकिक तथा वैदिक , मात्रा छन्द व वर्ण छन्द ।
* उपवेद कितने हैं ?
॰ चारों वेदों के चार उपवेद हैं । ऋग्वेदका उपवेद आयुर्वेध , यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद , सामवेद का उपवेद गान्धर्ववेद , अथर्ववेद का उपवेद स्थापत्य - कला व अर्थशास्त्र है ।
* चारो वेदों के गोत्रादि क्या हैं ?
॰ ऋग्वेद का आत्रेय गोत्र , ब्रह्म देवता , गायत्री छन्द है । यजुर्वेद का भारद्वाज गोत्र , रुद्र देवता , त्रिष्टुप छन्द है । सामवेद का काश्यप गोत्र , विष्णु देवता , जगति छन्द है । अथर्थवेद का वैजान गोत्र , इन्द्र देवता , अनुष्टुप छन्द है ।
* वेदान्त किसे कहते हैं ?
॰ वेद के अन्तिम भाग अर्थात् आखिरी ब्रह्मविद्या विषय वेदान्त उपनिषद कहते हैं । जिसमें ब्रह्मविद्या का निरुपण हो ।
* श्रुति किसे कहते हैं ?
॰ गुरु मुख से जिसका श्रवण किया हो  जिसका कोई कर्त्ता न हो उसे श्रुति कहते हैं " श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेयो "
* स्मृति किसे कहते हैं ?
॰ जिसमें प्रझा के लिये आचार - विचार - व्यवहार की व्यवस्था तथा समाज के शासन निमित्र निति और सदाचार सम्बन्धी नियम स्पष्टता पूर्वक हो उसे स्मृति कहते हैं । इसी को धर्मशास्त्र भी कहते हैं ।
* धर्म शास्त्र किसे कहते हैं ?
॰ जिसमें धर्माधर्म का निर्णय मिले उसे धर्मशास्त्र कहते हैं । इसे स्मृति भी कहते हैँ ।
* धर्म शास्त्र के निर्माता कौन थे ?
॰ धर्मशास्त्र के निर्माता महर्षि गण हैं । जिन्हें समाधि में वैदिक तत्त्वों का ज्ञान होता है वे ही धर्मशास्त्र के निर्माता व प्रवर्तक कहे जाते हैं जैसे - मनु , अत्रि , विष्णु , हारित , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगिरा , यम , आपस्तम्ब , सम्वर्त , कात्यायन , वृहस्पति , पराशर , व्यास , शंख , लिखित , दक्ष , गौतम , शातातप , वसिष्ठादि ।
* धर्म किसे कहते हैं ?
॰ वैदिक विधि वाक्यों द्वारा जिनकी कर्तव्यता का ज्ञान हो उसे धर्म कहते हैं । जिसमें अभ्युदय तथा श्रेयस सिद्धि हो उसे धर्म कहते हैं ।
* सनातन धर्म के क्या लक्षण है ?
॰ सनातन परमात्मा ने सनातन जीवों के सनातन  निःश्रेयस एवं अभ्युदय के लिए जिन सनातन परम कल्याणकारी नियमों का निर्देश जिसमें किया हो उसे सनातन धर्म कहते है।
यज्ञ कुण्ड मण्डप बनाने की चर्चा किन ग्रन्थो में है ?
॰ शुल्बसूत्र , कुण्डाक्रकुण्डकल्पतरु , कुण्डरत्नावलि में यज्ञकुण्ड और मण्डपादि बनाने का विधान है ।
* आगम किसे कहते हैं ?
॰ जिसमें सृष्टि , प्रळ , देवताओं की पूजा , सर्व कार्यों के साधन , पुरश्चरण , षट्कर्म साधन और चार प्रकार के ध्यान योग का वर्णन हो उसे आगम कहते हैं ।
* यामल किसे कहते है ?
॰ सृष्टि तत्त्व , ज्योतिष , नित्य कृत्य , सूत्र , वर्णभेद और युग धर्म का वर्णन जिसमें हो उसे यामल कहते हैं ।
* तन्त्र किसे कहते है ?
॰ सृष्टि , लय , मंत्र निर्णय , देवताओं के संस्थान , यंत्र निर्णय , तीर्थ , आश्रम धर्म , कल्प , ज्योतिष संस्थान , व्रत कथा , शौच , आशौच , स्त्री पुरुष लक्षण , राज धर्म , दान धर्म , व्यवहार तथा आध्यात्मिक विषयों जिसमें वर्णन हो उसे तन्त्र कहते हैं ।
* तैंतीस देवता के नाम क्या हैं ?
8 आठ वसु , 11 ग्यारह रुद्र , 12 आदित्य , 1 एक प्रजापति और 1 एक वषट्कार । इस प्रकार कुल 33 तैंतीस देवता होते हैं ।
* दशमहाविध्या के नाम क्या हैं ?
॰ काली , तारा , ललिता , भुवनेश्वरी , त्रिपुरभैरवी , छिन्नमस्ता , धूमावती , बगलामुखी , मातंगी और कमला ये दशमहाविद्या हैं ।
* संध्या - वन्दन का फल क्या है ?
॰ जो द्विज प्रतिदिन संध्या करता है वह पाप रहित होकर सनातन ब्रह्मलोक में जाता है ।
¤ जितने भी इस पृथ्वी पर विकर्मस्थ द्विज हैं उनके पवित्र करने के लिए स्वयंभू ब्रह्मदेव ने संध्या का निर्माण किया है ।
¤ रात्रि में तथा दिन में जो भी अज्ञान अर्थात् पाप किया गया हो वह तीनों काल की संध्या - वन्दन से नष्ट हो जाता है ।
* संध्या न करने का दोष क्या है ?
॰ जिसने संध्या को नहीँ जाना तथा उपासना भी नहीं की वह जिवित शुद्र है और संध्या न करने पर कुत्ते की योनी में जन्मता है ।
¤ संध्या न करने वाला सदा अपवित्र है सभी कार्यों के अयोग्य है दूसरा भी यदि कोई काम करता है तो उसका फल नहीं मिलता ।
* संध्या की व्याखा क्या है ?
॰ सूर्य नक्षत्र से वजित अहोरात्र की जो संधि है तत्त्वदर्शी हमारे पूर्वज ऋषि - मुनियों ने उसी को संध्या कहा है ।
* संध्या वन्दन का काल अर्थात् समय कब होना चाहिये ?
॰ संध्या का समय सूर्योदय से पूर्व ब्राह्मण के लिए दो मुहूर्त है । क्षत्रिय के लिए इससे आधा और उससे आधा वैश्य के लिए ।
¤ ताराओं से युक्त समय अति उत्तम समय है । ताराओं के लुप्त हो जाने पर मध्यम ।  सूर्य सहित अधम । इस प्रकार प्रातः संध्या तीन प्रकार की है ।
* तीनों काल की संध्या का नाम क्या है ?
॰ प्रभात काल की संध्या का नाम - गायत्री , मध्याह्न काल की संध्या का नाम - सावित्री और सायं काल की संध्या का नाम - सरस्वति है ऐसा तत्त्वज्ञ ऋषियों का वचन है ।
* त्रैकालिक संध्या के वर्ण कौन - कौन से हैं ?
॰ प्रभात काल की संध्या - गायत्री का वर्ण - लाल है , मध्याह्न काल की संध्या - सावित्री का वर्ण - शुक्लवर्ण और सायं काल की संध्या का वण - कृष्णवर्ण है उपासनार्थियों की उपासना के लिए है ।
* त्रैकालिक संध्या का रूप क्या है ?
॰ प्रातःकाल की संध्या - गायत्री - ब्रह्मरूपा , मध्याह्न संध्या - सावित्री - रुद्ररूपा और सायं काल की संध्या - सरस्वती - विष्णुरूपा है ।
* त्रैकालिक संध्या का गोत्र क्या - क्या है ?
॰ प्रातः काल की संध्या - गायत्री का गोत्र - सांङ्ख्यायन , मध्याह्न काल की संध्या - सावित्री का गोत्र - कात्यायन एवं सायं काल की संध्या - सावित्री का गोत्र - बाहुल्य है ।
* त्रैकालिक संध्या में कौन - कौन धातु पात्र का प्रयोग करना चाहिये ?
॰ भग्न तथा टूटे पात्र से संध्या करना निन्दिन है । उसी प्रकार धारा से टूटे हुए जल संध्या करना मना है । नदी में , तीर्थ में , ह्रद में - मिट्टी के पात्र से , उदुम्बर के पात्र से , सुवर्ण - रजत - ताम्र एवं लकडी के पात्र से संध्या करनी चाहिए ।
* त्रैकालिक संध्या - वन्दन में कौन - कौन से पात्र अपवित्र है ?
॰ काँसा , लौह , शीशा . पीतल के पात्रों से आचमन करने वाला कभी शुद्ध नही हो सकता। अतः इन धातुओं के बने पात्र अपवित्र हैं इन्हें संध्या - वन्दन मेँ प्रयोग न लेना चाहिये।
* किन - किन स्थानों पर संध्या - वन्दन करना विशेष फलप्रद है ?
* अपने धर अर्थात् अपने निवास स्थान पर संध्या - वन्दन करना समान फल प्रदायक है। गायों के स्थान पर सौगुना , बगीचा तथा वन में हजार गुना , पर्वत्र पर दस हजार गुना , नदी के तट पर लाख गुना , देवालय में करोड़ गुना , भगवान् सदाशिव शङ्कर के सम्मुख बैठकर जप करना , संध्या करने से अनन्त गुना फल मिलता है ।
¤ धर के बाहर संध्या करने से झूठ बोलने से लगा पाप , मद्य सूँघने से लगा पाप , दिवा मैथुन करने से लगा पाप नष्ट होता है । अतः संध्या धर से वाहर पवित्र स्थान में करना चाहिए ।
* संध्या - करने का समय अगर निकल जाए तो क्या  क्या करना चाहिए ?
॰ किसी कारण से संध्या का समय निकल जाये विलम्ब हो जाये तो श्री सूर्यनारायण भगवान् को चौथा अर्घ देना चाहिए इस अर्घ दान से कालातिक्रमणजन्य पाप नष्ट होता है।
* संध्या - वन्दन करने के लिये कौन से आसन उपयुक्त है ?
॰ कृष्णमृग चर्म पर बैठने से ज्ञान सिद्धि , व्याघ्रचर्म पर बैठने से मोक्ष प्राप्ति , दुःख नाश के कम्बल पर वैठना चाहिए । अभिचार कर्म करने के लिए नील वर्ण के आसन , वशीकरण के लिए रक्तवर्ण , शान्ति कर्म के लिए कम्बल का आसन , सभी प्रकार के सिद्धि के लिये कम्बल का आसन श्रेयस्कर है । बांस पर बैठने दरिद्रता , पथ्थर पर बैठने से गुदा रोग , पृथ्वी पर बैठने से दुःख , बिधी हुई लकड़ी अर्थात् छेद किया हुआ {किल लगी हुई } पर बैठकर संध्यादि करने से दुर्भाग्य , घास पर बैठने से धन और यश की हानी , पत्तों पर बैठकर जप करने - संघ्या करने से चिन्ता तथा विभ्रम होता है ।
* काष्ठासन तथा वस्त्रासन का माप क्या होना चाहिए ?
॰ काष्ठासन 24 अंगुल लम्बा 18 अंगुल चोड़ा 4 या 5 अंगुल ऊँचा होना चाहिए , वस्त्रासन 2 हाथ से ज्यादा लम्बा नहीं होना चाहिए 1 एक हाथ से ज्यादा चौड़ा न हो , 3 अंगुल से ज्यादा मोटा नहीं होना चाहिए ।
* लकड़ी की खड़ाऊँ कहाँ - कहाँ नहीं पहना चाहिए ?
॰ आग्न्यागार में , गौशाला में . देवता तथा ब्राह्मण के सम्मुख , आहार के समय , जप के समय पादुका का त्याग कर देना चाहिए ।
* संध्या करते समय मुख किस दिशा में रखें ?
॰ पवित्र होकर ब्राह्मण संध्योपासना करते समय पूर्व दिशा में मुख करके बैठे तथा जप भी पूर्वाभिमुख करे ।
¤ जहाँ कर्त्ता का अंग न उल्लेख हो वहाँ दक्षिण अंग समझना चाहिए ।
¤ जप होमादि कर्मों में जहाँ का उल्लेख न हो वहाँ पूर्व ईशान ओर उत्तर दिशा समझे ।
¤ दैवकार्य रात्रि को सदा उत्तराभिमुख करना चाहिए ।
¤ शिवार्चन भी उत्तराभिमुख करना चाहिए ।
¤ जहाँ निरन्तर सूर्य उगता है वेदज्ञ उसी को प्राची पूर्व दिशा कहते हैं ।
¤ ईशानमुख या पूर्वाभिमुख होकर संध्या - वन्दन करें ।
* भस्म धारण कैसे करें ?
॰ प्रातः जल मिलाकर , मध्याह्न चंदन मिलाकर तथा सायं केवल भस्म ही लगावें ।
भस्म कौन सी लेनी चाहिए ?
॰ श्रीगङ्गाजी के तीर पर उत्तम मिट्टी को जो ललाट पर लगाता है वह तमोनाश हेतु भगवान् श्रीसूर्यदेव के तेज को लगाता है ।
¤ गोमय को जलाकर की हुई भस्म ही त्रिपुण्ड्र के योग्य है ।
¤ स्नानकर मिट्टी - भस्म - चंदन व जल से त्रिपुण्ड्र अवश्य करें किन्तु जल में जल त्रिपुण्ड्र करें ।
* भस्म धारण के प्रकार क्या हैं ?
॰ भस्म से त्रिपुण्ड्र - मिट्टी से ऊर्ध्व - अभ्यंगोत्सवादि रात्रि में चंदन से दोनों करें ।
¤ गृहस्थ को सदा जल मिश्रित ही भस्म लगाना चाहिए ।
¤ यति केवल भस्म ही लगाना चाहिए ।
¤ दाहिने हाथ की मध्य की तीन अंगुलियों से विद्वान लोग त्रिपुण्ड्र धारण करें जो सब पापों को नाश करने वाला है ।
¤ जो त्रिपुण्ड्र धारण नहीं करता उसके लिए सत्य , शौच , जप , होम , तीर्थ , देव - पूजन सभी व्यर्थ हैं ।
* भस्म कहाँ - कहाँ धारण करें ?
॰ ललाट , हृदय , नाभी , कण्ठ , बाहुसंधि , पृष्टदेश , शिर - इन स्थानों में भस्म लगावें ।
* त्रिपुण्ड्र कितना लम्बा होना चाहिए ?
॰ ब्राह्मण के लिए 8 आठ अंगुल लम्बा , क्षत्रिय के लिए 4 चार अंगुल लम्बा , वैश्य के लिए 2 दो अंगुल लम्बा शेष शुद्रादि के लिए 1 एक अंगुल लम्बा त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिए ।
* त्रिपुण्ड्र किसे कहते हैं ?
॰ भ्रुवों के मध्य से प्रारम्भ कर जब तक भ्रुवों का अन्त न हो मध्यमानामिका अंगुलियों से मध्य में प्रतिलोम अंगुठे से जो रेखा की जाती है उसे त्रिपुण्ड्र कहते हैं ।
* करमाला किसे कहते हैं ?
॰ मध्याङ्गुली के आदि के दो पर्वों को जप काल में छोड़ देना चाहिए । स्वयं श्रीब्रह्माजी का कथन है कि उसे मेरु मानना चाहिए ।
* मेरु लंघन ने क्या दोष लगता है ?
॰ मेरुहीन तथा मेरु के लांघने वाली माला अशुद्ध होती है तथा निष्फल है ।
* माला किस चीज़ की उत्तम होती है ?
॰ अरिष्ट पत्र एवं बीज , शङ्ग पद , मणि , कुशग्रन्थी , रुद्राक्ष ये क्रमशः उत्तरोत्तर उत्तम है।
* जप के लिए माला किसकी होनी चाहिए ?
॰ प्रवाल , मुक्ता , स्फटिक , ये जप के लिए कोटी फलप्रद माने गये
* भस्म न धारण करने से क्या दोष लगता है ?
॰ स्नान , दान , जप , होम , संध्या - वन्दन , स्वाध्यायादि कर्म ऊर्ध्व पुण्ड्र { त्रिपुण्ड्र } विहिन के लिए निरर्थक है अर्थात् इनका कोई भी फल नहीं मिलता ।
¤ ललाट पर तिलक कर के ही संध्या - वन्दन करें जो ऐसा नहीं करता उसका किया हुआ सब निरर्थक है ।
¤ तुलसी की माला अक्षय फल दायक माना गया है ।
* माला का दाना किन - किन अंगुलियों से बदला जाये ?
॰ अंगुठे और मध्यमा अंगुली से माला का दाना बदलनी चाहिए । तर्जनी अर्थात् अंगुठे की बगल वाली अंगली से माला के मनके अर्थात् दाने का स्पर्श भी नहीं करना चाहिए । क्योंकि मध्यमा अंगुली आकर्षण करने वाली तथा सब प्रकार की सिद्धि प्रदायक होती है ।
* कर्म विशेष में दर्भ का क्या प्रमाण है ?
॰ ब्रह्मयज्ञ में गोकर्णमात्र दो दर्भा , तर्पण में हस्तप्रमाण तीन दर्भा ।
* गोकर्ण किसे कहते हैं ?
॰ तर्जनी और अंगुठे को फैलाकर जो प्रादेश प्रमाण होता है उसे ही गोकर्ण कहते हैं ।
* वितरित किसे कहते हैं ?
॰ कनिष्टिका तथा अंगुठे के फैलाने पर वितरति होता है जिसे विलांत या द्वादशाङ्गुल कहते हैं ।
* पवित्र कैसी दर्भा का होता है ?
॰ अनन्त गर्भवति अग्रभाग सहित दो दलवाली प्रादेशमात्र कुश का पवित्र होता है । मार्कण्डेय पुराण के मत से ब्राह्मण को 4 चार शाखा वाली दर्भा से , क्षत्रिय को 3 तीन शाखा वाली दर्भा और वैश्य को 2 शाखावाली दर्भा से पवित्र बनाना चाहिए ।
* सपवित्र हस्त से आचमन करना या नहीं करना चाहिए ?
¤ सपवित्र  हस्त से आचमन करने से वह पवित्र उचिष्ट नहीं होता है ।
* कौन - कौन से कर्म दोनों हाथों में दर्भा लेकर करना चाहिए ?
॰ स्नान , दान , होम , जप , स्वाध्याय , पितृकर्म तथा संध्या - वन्दन दोनों हाथ में दर्भा लेकर करें ।
* पवित्र किसे कहते हैँ ?
2 दो अंगुल जिसका मूल भाग हो , 1 एक आंगुल की ग्रन्थी हो और 4 चार अंगुल जिसका अग्रभाग हो उसे पवित्र कहते हैं ।
* ब्रह्मग्रन्थी और वर्तुल ग्रन्थी कहाँ - कहाँ लगाना चाहिए ?
॰ ब्रह्मयज्ञ में , जप में , पहने जाने वाले पवित्र में ब्रह्मग्रन्थी लगावें ।
* ब्रह्मग्रन्थी तथा वर्तुल ग्रन्थी में क्या भेद हैं ?
॰ ब्रह्मग्रन्थी तथा वर्तुल ग्रन्थी परस्पर विपरीत क्रम से हैं ।
* कुशा तथा दूर्वा की पवित्री में अधिक उत्तम कौन हैं ?
॰ कुशा तथा दूर्वा की पवित्री से भी उत्तम सुवर्ण की पवित्री उत्तम है ।
* कुशा के अभाव में क्या - क्या लेना चाहिए ?
॰ कुशा के अभाव में काश , क्योंकि कुश काश के समान हैं । काश के अभाव में अन्यदर्भा भी उचित है , दर्भा के अभाव में स्वर्ण , रोप्य , ताभ्र भी ग्रहण किया जाता है ।
* दश दर्भायें कौन - कौन से होते हैं ?
॰ कुश , काश , शर , दुर्वा , यव , गोयुम , बलबज , सुवर्ण , रजत और ताम्र ये दश दर्भा कहलाती हैं ।
* यदि दोनों हाथो के लिए पवित्री न हो तो क्या करें ?
॰ यदि दोनों हाथो के लिए पवित्री न हो तो दाहिने हाथ के लिए तो पवित्री अत्यावस्यक है ।
* सुवर्ण पवित्री कितने वजन का हो ?
॰ सुवर्ण पवित्री 16 माशे से ऊपर वजन की बनानी चाहिए , इससे कम वजन की नहीं हो।
* शिखा बंधन मंत्र से करें या वैसे ही ?
॰ अमन्त्रक शिखा बंधन करने से जप होमादि सभी वृथा हो जाते हैं ।
* सदा यज्ञोपवीत और शिखा बाँधे क्यों रखना चाहिए ?
॰ बिना यज्ञोपवीत तथा बिना शिखा बाँधे रहने वाले व्यक्ति का किया हुआ सभी कर्म निरर्थक हो जाता है । उसका कोई फल नही प्राप्त होता ।
* शिखा बंधन सहित कौन - कौन कार्य करें ?
॰ शौच , दान , जप , होम , संध्या , देवपूजादि कार्य शिखा बाँध कर ही करना चाहिए ।
* शिखा कहाँ - कहाँ खुली रखें ?
॰ शौच , शयन , स्त्रीसंग , भोजन , दन्तधावन करते समय शिखा खुली रखनी चाहिए ।
क्रमशः .....

Tuesday, May 15, 2012

दुःखी कौन ? -  " प्रज्ञापराध एव एष दुःखमिति यत्-
" दुःखी यदि भवेदात्मा कः साक्षी दुःखिनो भवेत् । " -
{ नैष्कर्म्यसिद्धिः 2 / 76 }
वार्तिककार आचार्य सुरेश्वर अपने नैष्कर्म्यसिद्धः नामक ग्रन्थ में कहते है -
" दुःखि यदि भवेदात्मा कः साक्षी दुःखिनो भवेत् । "
कितनी सुन्दर बात हमारे आचार्य जी कह रहे हैं - यदि आत्मा दुःखी होता , तो " मैं दुःखी हूँ " या " मैं दुखी था " - इसका गवाह कौन है ? इसका साक्षी कौन है ? क्योंकि , किसी वस्तु की सिद्धि दो तरह से होती है । अदालत में मुकदमा जाये तो जज को दो चीज चाहिए - एक तो लिखन्त दस्तावेज हो और दूसरे , गवाह { साक्षी } चाहिए । शास्त्र तो दस्तावेज हैं , निर्णय करने के लिए लिखित प्रमाण है और फिर साक्षी भी चाहिए । तो , देखिए मेरे भाई , यदि दूसरे के बारे में कोई बात जाननी हो तो जैसी लिखी हो , वैसा मानना पड़ेगा और अपने बारे में कोई बात जाननी हो तो वहाँ स्वानुभूति का प्रमाण मुख्य होगा । अपनी आँख से देखी हुई जो चीज़ होती है , उसके लिए लाख लिखा मिल जाय , लेकिन अपनी आँख की देखी हुई जो चीज़ होती है , उसपर अविश्वास नहीं होता है । माने हमारी प्रमाण्य - बुद्धि जो है , वह स्वानुभूति में अधिक है । बेटा भी आकर कहे , पत्नी भी कहे , माँ भी कहे , लेकिन अपनी आँख से देखी हुई चीज़ होवे तो किसीकी भी बात नहीं मानते हैं , अपनी आँख की बात मानते हैं ।
अब यह जो " मैं दुःखी हूँ " - यह कहाँ लिखा हुआ है , इसलिए आप अपने को दुःखी मानते हो कि आप अपने दुःखीपने के स्वयं साक्षी हो ? कोई दूसरा कहे कि " आप दुःखी हो " तो आप कैसे मान सकते है ? दूसरे के कहने से नहीं मानेंगे , दूसरे के लिखने से नहीं मानेंगे। हम ही तो अपने दुःखीपने के साक्षी हैं । अब जो जिसका साक्षी होता है , वह उससे भिन्न होता है - यह नियम है भाई । हम घड़े को जानते हैं , तो घड़े से अलग होते हैं । देह को जानते हैं तो देह से अलग होते हैं । अपने दुःखीपने को हम जानते हैं , सो दुःखीपने से हम अलग होते हैं । यदि हम अपने दुःखीपने को नहीं जानते है तो हम दुःखी नहीं हैं और यदि दुःखीपने को जानते र्है , तो भी दुःखी नहीं हैं । यह क्या आश्चर्य है ? " दुःखी यदि भवेदात्मा , कः साक्षी दुःखीनो भवेत् " ? " दुःखीनो साक्षिता नास्ति " - जो दुःखी है , वह गवाह नहीं है । वह तो लड़ाई करने वाला है । और , " साक्षिणो दुःखिता तथा " - जो साक्षी है , वह दुःखी नहीं है ।
भाई साहब , यह आत्मा जो है वह दुःखी नहीं है । भगवान् आचार्य सुरेश्वर कहते हैं -
" नर्ते स्याद् विक्रियां दुःखी , साक्षिणा का विकारिणः "
{ नैष्कर्म्यसिद्धिः 2 / 77 }
आचार्य जी कहते हैं कि - विकार के बिना कोई दुःखी नहीं हो सकता है ।
जब सड़ाँध पैदा होती है , तब मनुष्य दुःखी होता है । चाहे शरीर में सड़ाँध पैदा हो कि इन्द्रियों में सड़ाँध पैदा हो कि मन में सड़ाँध पैदा हो । विकार अर्थात् किसी चीज़ का सड़ना । एक रूप से दूसरे रूप मेँ बदल जानां । बिना परिवर्तन के कोई दुःखी नहीं हो सकता । हमारी जो चीज़ थी , वैसी नहीं रही , बदल गयी , तब न हम दुःखी हुये ! तो बिना विकार के कोई दुःखी नहीं हो सकता और " साक्षिका का विकारिणः " - जो विकारी है, वह साक्षी नहीं है । जो बदल रहा है , वह गवाह नहीं है । बदलने  का तो गबाह है न । अतः -
" धीविक्रिया सहस्त्रणां साक्ष्यतोऽहमविक्रियः "
मैं सहस्त्र - सहस्त्र विकारों का साक्षि हूँ । दिन भर में बुद्धि सैकड़ों रूप बदल लेती है - यह प्रिय है , यह अप्रिय है , यह मेरा है और यह तेरा है ? यह दुःख है , यह सुख है । यह बुद्धि बहरूपिया है । " माया महाठगिनि हम जानी " , " रमैया का दुलहिन , लूटा बाजार " । यह तो वेश्या की तरह श्रृङ्गार करती रहती है , रूप बदलती रहती है । कभी आँसू गिराती है , कभी हँसाती है , मुस्कुराती है । इस वेश्या के समान बुद्धि के हजारो विकारों के हम साक्षी हैं । " अतोऽहमविक्रियः " - मैं तो निर्विकार हूँ और निर्विकार में दुःखीपना होता नहीं है ।
तो फिर यह दुःखीपना कहाँ से आया ?
यह भूल से दुःख माना गया है । भूल के सिवाय दुःख का कोई कारण नहीं है ।
" प्रज्ञापराध एव एष दुःखमिति यत् "
जिसकै हम दुःखी कहते हैं , वह प्रज्ञा का अपराध है अर्थात् समझ का कसूर है ।
जब - जब हम दुःखी होते है . तब समझना हमारी समझ कुछ गलती कर रही है ।
जय हो सदाशिव !

Thursday, May 10, 2012




॥ सप्रदाय परंपरा श्लोकानि ॥

ॐ नमो ब्रह्मादिभ्यो ब्रह्मविद्यासंप्रदायकर्तृभयो वंशऋषिभ्यो महद्भ्यो नमो गुरुभ्यः ।
सर्वोपप्लवरहितः प्रज्ञानघनः प्रत्यगर्थो ब्रह्मैवाहमस्मि ॥ १ ॥
ॐ नारायणं पद्मभवं वसिष्ठं शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च ।
व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यं ॥ २ ॥
श्रीशंकराचार्यमथास्य पद्मपादं च हस्तामलकं च शिष्यम् ।
तं तोटकं वार्तिककारमन्यानस्मद्गुरून्संततमानतोऽस्मि ॥ ३ ॥
श्रुतिस्मृतिपुराणानामालयं करुणालयम् ।
नमामि भगवत्पादं शंकरं लोकशंकरम् ॥ ४ ॥
शंकरं शंकराचार्यँ केशवं बादरायणम् ।
सूत्रभाष्यकृतौ वन्दे भगवन्तौ पुनः पुनः ॥ ५ ॥
ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिने ।
व्योमवद्व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ॥ ६ ॥
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Wednesday, May 9, 2012


" वेदान्त के प्रकाण्ड विद्वान " श्रीहर्ष  " -
वेदान्त के प्रकाण्ड विद्वान " श्रीहर्ष " { खण्डनखण्डखाद्य ग्रन्थ के रचनाकार } । इनके पिता वेदान्त के प्रकाण्ड विद्वान थे और कन्नौज राज्य के मुख्य पण्डित थे । उस काल मेँ " उदयनाचार्य " न्याय के एक प्रकाण्ड पण्डित हुए । उदयनाचार्य ने श्रीहर्ष के पिता से कहा कि " हम तुमसे शास्त्रार्थ करेँगे । " उदयना चार्य बड़े विद्वान भी थे और बड़े भक्त भी थे लेकिन " नैयायिक " होने के कारण कट्टर द्वैतवादी थे । बड़े अच्छे भक्त थे लेकिन द्वैतवादी थे । सभा बैठी हुई थी , शास्त्रार्थ हुआ । शास्त्रार्थ मेँ श्रीहर्ष के पिता यद्यपि वेदान्त के पक्ष को लिये हुए थे लेकिन उदयनाचार्य से वे हार गये , क्योँकि शास्त्रार्थ बुद्धि का खेल है और विद्वान् उदयनाचार्य प्रकाण्ड थे । उस काल मेँ राजा ही धर्म का निर्णायक होता था । श्रीहर्ष के पिता जी बड़े दुःखी होकर घर आये । उस समय कान्यकुब्ज बहुत बड़ा राज्य था । भारत मेँ उसका स्थान प्रायः सम्राट जैसा था । श्रीहर्ष के पिता को मन मेँ बड़ा दुःख हुआ कि " मैँ ऐसा नालायक निकला कि मैने वेदान्त पक्ष को हारने दिया । अब राजा सर्वत्र द्वैतवाद का प्रचार करेगा । " नियम था कि शास्त्रार्थ मेँ जो विजयी हो जाये , चूँकी विचार के द्वारा निर्णय होता था , इसलिये वही ठीक है ऐसा निश्चय किया जाता था । जैसे कोई बहुत बड़ा सेनाध्यक्ष हो और उसकी किसी सैन्य व्युहरचना मेँ कोई खराबी आ जाने से वह बड़ा भारी युद्ध हार जाये तो उसके हृदय मेँ बड़ी चोट लगती है कि " मैँने अपने देश को अपनी गलती से खराब कर दिया " , इसी प्रकार धर्म के आचार्य का शास्त्र और बुद्धि ही सैन्यव्युह है , उसमेँ कोई विरोधी जीत जाये तो उसके मन मेँ भी होता है कि " मैँने अपने धर्म को अपनी बेवकूफी से नष्ट कर दिया है । " उसे हृदय मेँ कसक होती है । लेकिन जिसके हृदय मेँ यह कसक नहीँ होती , देश प्रेम नहीँ होता है , वह व्याख्या दिया करता है कि मैँ अमुक - अमुक कारणोँ से हार गया । इसी प्रकार जहाँ धर्म के प्रति कसक नहीँ होती , वह बैठकर बातेँ करता है कि हिन्दुस्तान के हिन्दु धर्म के पतन का क्या कारण है । कोई कहेगा छुआछूत कारण है , कोई कहेगा कि गरीबोँ की मदत नहीँ करते यह कारण है । ये सब बाते तो करेँगे लेकिन स्वयं कोई कदम नहीँ उठायेँगे । यदि मानते हैँ कि छुआछूत कारण है तो आपने उसे हटाने के लिये क्या किया है ? यदि आप मानते हो कि गरीबोँ के प्रति हमारी दृष्टि नहीँ थी तो उसके लिये क्या आपने अपनी आमदनी का आधा रुपया निकालकर मदत करने के लिये दे दिया ? जैसे देशद्रोही सेनाध्यक्ष ऐसे ही धर्म - द्रोही विद्वान भी हुआ करते हैँ । लेकिन श्रीहर्ष के पिता ऐसे नहीँ थे । उन्हेँ इस बात का बड़ा दुःख हुआ कि वेदान्त धर्म , अद्वैतवाद की जगह अब द्वैती जीतेँगे । उदयनाचार्य वहाँ सभापण्डित बन गया । घर वापिस आकर श्रीहर्ष के पिता के मन मेँ इतना दुःख हुआ कि सप्ताह भर मे उनका शरीर छूट गया । उनका दो साल का पूत्र था । मरने से पहले अपनी पत्नी से कहा कि " मैँ तो वह दिन नहीँ देखूँगा , क्योँकि मेरे से अब सहन नहीँ होगा , लेकिन मेरे पुत्र को तुम अच्छी तरह तैयार करना । मैँ तेरे को वह मन्त्र बता जाता हूँ , पाँच वर्ष की उम्र मेँ इसका उपनयन करा देना और उसी दिन इस मन्त्र को इसे देकर इसे किसी शव पर बैठाना । शव पर बैठकर रात भर यह इस मंत्र का जप करता रहे तो इसे वाक् सिद्धि हो जायेगी और यह फिर वेदान्त - ध्वज को ऊँचा करेगा । वे तो उसी दिन मर गये ।
तीन साल बाद श्रीहर्ष पाँच साल का हो गया । माँ सोचने लगी कि " मैँ इसे शव पर कैसे बैठाऊँ ? यदि बैठा भी दिया तो इसे डर लगेगा । " लेकिन पति की आज्ञा थी कि जिस दिन उपनयन हो , उसी दिन यह भी कार्य करना । वह भी पूर्ण धर्मनिष्ठा वाली थी क्योँकि ऐसे पति की पत्नी थी । " हे मेरे नारायण ! " उसने जहर खा लिया और श्रीहर्ष को अपनी छाती पर बैठाकर कहा कि " रात भर इस मन्त्र का जप करते रहधा । " बेटे को इस बात का क्या पता था , वह तो माँ की छाती पर बैठा था , थोड़ी देर मेँ वह मर गई और वह रात्री भर जप करता रहा । प्रातःकाल चार बजे " भगवती वाणी " { श्रीमाता वाग्देवी } ने दर्शन दिया और बड़े प्रेम से स्पर्श करके कहा " बेटा क्या चाहिये ? " श्रीहर्ष ने कहा " मुझे पता नहीँ माँ से पूछो । " भगवती वाणी की आँख से पानी आ गया , कहा " अब तेरी माँ नहीँ रही । आज से " श्रुति " ही तेरी माता है । श्रुति का कोई मन्त्र ऐसा नहीँ होगा जो तुमको उपस्थित नहीँ होगा । " भगवती ने यह वर दिया , कहा कि " अब तुम सीधे कान्यकुब्जेश्वर के यहाँ जाकर उदयनाचार्य के साथ शास्त्रार्थ करना । मैँ ही तेरी वाणी पर बैठकर शास्त्रार्थ करूँगी । " भगवती के स्पर्श से उसके हृदय मेँ विद्या का प्रादुर्भाव हुआ । वहाँ से गया और जाकर राजा के द्वारपाल से कहा कि " मैँ सभापण्डित उदयन से शास्त्रार्थ करना चाहता हूँ , राजा को खबर कर दो । " द्वारपाल हँस पड़ा और बच्चे को प्यार करने लगा जैसे छोटे बच्चे को करते हैँ । श्रीहर्ष ने कहा " मैँ ऐसे ही बात नहीँ कर रहा हूँ । " द्वारपाल श्रीहर्ष को लेकर राजा के पास पहुँचे और राजा ने देखा कि सुन्दर लड़का है , यज्ञोपवीत धारण किये हुये , भस्म लगा हुआ है । द्वारपाल ने राजा से कहा कि यह कहता है कि " मैँ सभापण्डित उदयन से शास्त्रार्थ करना चाहता हूँ । श्रीहर्ष झट से बोला " सभापण्डित नहीँ , उदयन से शास्त्रार्थ करूँगा ! मैँ उसे सभापण्डित नहीँ मानता । वह तो मैँ उसे शास्त्रार्थ के बाद मानूँगा । " राजा ने कहा " तेरे को किसने बताया है ? " कहा " इन सब बातोँ मेँ कुछ नहीँ रखा , राजन ! इन्हेँ मेरे सामने बैठाओ , मैँ शास्त्रार्थ करूँगा । " श्रीहर्ष ने देववाणी संस्कृत मेँ जबाब दिया तो उदयनाचार्य भी कुछ घबराये कि यह छोटा - सा बच्चा कैसे बोलता है ! अगले दिन शास्त्रार्थ का समय तय हुआ । सब समझे कि यह कोई तमाशा होगा । लेकिन 28 दिनोँ तक शास्त्रार्थ हुआ । सब आश्चर्यचकित हो गये कि यह कैसा लड़का है । श्रीहर्ष ने उदयन को शास्त्रार्थ मेँ हरा दिया और वेदान्त की ध्वजा फहराया । तब उसने बताया " मेरे पिता अमुक थे । तुने उनका अपमान किया , इसलिये मैँने यह किया । मुझे तुमसे कोई द्वेष नहीँ है । " फिर उन्होने वेदान्त - ग्रन्थोँ और अन्य ग्रन्थो की रचना की । साहित्य का ग्रन्थ उन्होँने पहले - पहले लिखना शुरु किया तो अपने मामा , जो साहित्य के बड़े विद्वान थे , उन्हेँ अपना ग्रन्थ दिखाया । मामा जी ग्रन्थ को देगर पहले तो बड़े प्रसन्न हुए और फिर रोने लगे ! श्रीहर्ष ने पृछा तो कहा " मेरे काल मेँ मेरा भांजा इतनी तीक्ष्ण प्रतिभा वाला उत्पन्न हुआ इससे मेरे को बड़ी प्रसन्नता हुई और रोया इसलिये कि तेरी किताब बाँचेगा कौन ? मेरे जैसा साहित्य - मीमांसक एक - एक श्लोक को पचास - साठ बार पढ़ता है तो समझ मेँ आता है । बाकी कौन ऐसा है जो तेरी किताब बाँचेगा । इसलिये मुझे दुःख हुआ । उनके " खण्डनखण्डखाद्य " ग्रन्थ को समझना महान् कठिन है । आज भी इस महान् ग्रन्थ पर किसी भी विद्वान ने अपना टीका नहीँ लिख सके ।
माँ भारती सपुत को शत - शत प्रणाम करता हूँ ।

                         
                       " परमेश्वर- पशुपति "
                    
शिव । शिव ।। परमेश्वर का एक नाम है " पशुपति " । यहाँ जो पशु कहा जाता है वह उसके वाहन ऋषम या पहरेदार " नन्दी " को सूचित नहीँ करता । पशु हम ही हैँ । जीव सब पशु है । उनके मालिक अर्थात् स्वामी के रूप मेँ जो ईश है वही पशुपति है ।
पशु जिस स्थान मेँ हरे पत्ते हो उस स्थान की ओर भागते हैँ । उनके समान हम भी इन्द्रियसुख को खोजते - खोजते भागते रहते हैँ । मालिक जैसे अपने पशु को बाँध रखते है वैसे पशुपति ईश्वर हमेँ बाँध रखता है ।
दीख सकता है कि - " कहाँ बाँध रखा है ? कोई बन्धन आँखोँ के किए दिखाई नहीँ देता है । फिर भी अनजान मेँ ही हम इस बंधन के बारे मेँ समय समय पर बोलते हैँ । एक कार्य के लिए हम बहुत प्रयत्न करते हैँ । फिर भी वह सफल नहीँ होता । उस समय हम यह कहकर अपने आप को तसल्ली दिला लेते हैँ कि " यथा शक्ति किया । फिर भी कर्मबन्ध किसको छोड़ता है ? काम सफल नहीँ हुआ । कर्म बंध जो है वही बन्धन है। पशुपति ने हमेँ पूर्वकर्मो से बाँध दिया है । "
रस्सी से बंधे जानवर को उस रस्सी पर गुस्सा होगा , पर उसे खोल दिया जाय तो क्या होता है ? वह दूसरे बगीचे मेँ चरता है । बाद मेँ बगीचे का मालिक उसे मारमार कर उसका कचुमर निकाल देता तो हम उसे बाँध देते हैँ । हममेँ इच्छा नामक बदमाशी है , इसलिए पशुपति ने हमेँ बाँध रखा है । अगर बच्चे की विषमबुद्धि चली जाय तो हम उसे बाँध कर न रखेँगे । हमारी इच्छा न रहे तो भगवान् भी हमेँ मुक्त करेँगे । इच्छा के कारण ही हम कई लोगोँ को कष्ट देकर खुद कष्ट उठाते हैँ । इच्छा मिट जाय तो किसी को हमारी ओर से कोई कष्ट नही होगा । ईश्वर खोल देँगे ।
बन्धन मिट जाय तो हम दूसरे के बगीचे मेँ नहीँ चरेँगे , क्योँकि दूसरे के बगीचे न चरने की बुद्धि हममेँ आ जाय तभी पशुपति बन्धन को निकालते हैँ । बन्धन के निकलने के बाद बन्धन की स्थिति से उन्नत होकर हमेँ  जिसने बाँधा था उसकी स्थित मेँ पहुँच जायेँगे । बन्धन जब तक रहे तब तक हम अलग हैँ , और भगवान् अलग । इसलिए हम उनकी पूजा करते हैँ । " बन्धन चला जाय तो हम जान लेँगे कि हम ही वह है । " बाद मेँ पूजा की भी जरूरत नहीँ होती ।
श्रुतिमहारानी कहती है कि एक स्थिति तक जीव पशु है । वह कौन स्थिति है ? कहा है-
" देवतां अन्यां उपासते "
इसका सामान्य अर्थ बताया जाता है कि अपने इष्ट देवता को छोड़कर उससे अन्य किसी देवता का उपासक पशु है । यह गलत है । " अपने पूजित देवता अपने लिए अभी इतनी होड़ , ईर्ष्या , लड़ाई . झगड़ा है तो तब कैसे होगा ? उसकी कल्पना भी नहीँ कर सकते। अपनी सभी इच्छाओँ को , सबको कार्यरूप मेँ लाने के प्रयत्न न करने की रीति से हमेँ कर्म ने बन्धन मेँ बाँध रखा है न ? इससे हम बचते गये न ?
पशु को न बाँध रखे तो वह पौधोँ का नाश करता है । स्वयं मार खाता है । उसी तरह कर्म से हमेँ ईश्वर बाँध न रखता तो हम अपने आपको भ्रष्ट कर लेते और संसार को भ्रष्ट कर करते । अब भी हम संसार को भ्रष्ण करते हैँ । अगर कमजोरी मेँ ऐसा करेँ तो स्वेच्छा का पूर्णबल हो तो हम कितना बिगाड़ेँगे ? रस्सी लगाकर बाँधने के कारण ही कम से कम किसी समय मेँ पशु को खूँटे के पास लेटना संभव होता है । कर्म हमेँ बांध देता है । इसलिए हम कभी न कभी उसके खूँटे ईश्वर पर चित्त को लगाते है । नहीँ तो ईश्वर को एकदम भूलकर योँ संसार सागर मेँ उलझे रहेँगे ।
भगवान् ने हमेँ इसलिये बांध रखा है कि हम अपनी भलाई के लिए खुद अपने को कष्ट देने न रहेँ। उनसे पूछे कि - कब खोल देँगे ? तो वे कहते है - अगर तुममेँ किसी को कोई कष्ट न देकर और उससे अपने लिए कोई पाप न कमाने की परिपक्वता आ जाये तो मैँ खोल दूँगा ।
बच्चा नटखटपन करता है है । बाद मेँ उसे कांची हाउस मेँ बन्द कर देता है । तमी पशु को मालूम होता है कि हमेँ रस्सी से बाँध कर ही रखना अच्छा है । इसी तरह हमेँ भी कर्म बन्धन के प्रति गुस्सा होता है । अगर भगवान् ऐसा बंधन नहीँ लगाता तो हमेँ हार व दुःख सब नहीँ होते । हार व दुःख के आने पर हम बुद्धि पाते हैँ कि हमेँ इतना ही बंधा है और जीवित रहते समय तृप्ति से , शान्ति से जीवन बिताने का यत्न करते हैँ । अगर यह नहीँ होता तो हमारी इच्छा व योजना का कोई अंत नहीँ होता । इतने जोर के बंधन रहते ही हर एक की इच्छा भले ही उसके लिए सारी सृष्टि की आहुति करेँ तब भी पर्याप्त नहीँ होती । द्युलोक को काफी न मानकर चन्द्रमण्डल , मंगलग्रह की बाते करते हैँ। बंधन ही रहा तो पूछने की ही जरूरत ही नहीँ रहती । है । बाद मेँ उसे कांची हाउस मेँ बन्द कर देता है । तमी पशु को मालूम होता है कि हमेँ रस्सी से बाँध कर ही रखना अच्छा है । इसी तरह हमेँ भी कर्म बन्धन के प्रति गुस्सा होता है । अगर भगवान् ऐसा बंधन नहीँ लगाता तो हमेँ हार व दुःख सब नहीँ होते । हार व दुःख के आने पर हम बुद्धि पाते हैँ कि हमेँ इतना ही बंधा है और जीवित रहते समय तृप्ति से , शान्ति से जीवन बिताने का यत्न करते हैँ । अगर यह नहीँ होता तो हमारी इच्छा व योजना का कोई अंत नहीँ होता । इतने जोर के बंधन रहते ही हर एक की इच्छा भले ही उसके लिए सारी सृष्टि की आहुति करेँ तब भी पर्याप्त नहीँ होती। द्युलोक को काफी न मानकर चन्द्रमण्डल , मंगलग्रह की बाते करते हैँ। बंधन ही रहा तो पूछने की ही जरूरत ही नहीँ रहती ।अन्य है । यह सोचकर जो पुजा करता है वही पशु है । " यही इसका ठीक अर्थ है । योँ भगवान् अलग हैँ भक्त अलग है । यह भेद बुद्धि जब तक रहती है तब तक कर्म है । कर्म जब तक है तब तक बन्धन भी है ।
शास्त्र मेँ कहे धर्म कार्य का बंधन दूसरी रस्सी ( रज्जु ) के समान है । वह गाँठ के साथ लगता बंधन नहीँ है । बन्धन के समान लगेगा । शास्त्र के नियम बहुत कठोर , अनिवार्य और वन्धित करने के समान लगेँगे , पर इन्द्रियोँ के द्वारा जो पक्की गाँठ का बन्धन लगता है , उस इच्छा के बन्धन से छूटकर अन्त मेँ पूर्णशान्ति , सुख व मुक्ति प्राप्त करनी है तो यह बन्धन अवश्य लगे रहना है ।
इच्छा का बन्धन चला जाय तो शास्त्र का बन्धन भी चला जायेगा । पर उसके दूर होने के लिए हमेँ दूसरे बन्धन को अपने आप लगा लेना चाहिए । धार्मिक रूप से मनुष्य कार्य, देवकार्य , पूजा . यज्ञ , परोपकार , जीवात्मकैँकर्य आदि सब करना चाहिए । इच्छा चली जाय तो ये दैवकार्य , वैदिक कार्य , समाजिक कार्य सब रुक जायेँगे ।
अगर व्यक्ति इस स्थिति को पहुँच जाय तो देवता लोगोँ को उक्त साधक पर गुस्सा आता होगा । मनुष्य वैदिक कार्य करे तो ही देवताओँ को आहुति मिलेगी , नहीँ तो वे भूखे रहेँगे । इसलिए अगर यह कर्म को छोड़कर , यज्ञ . तर्पण . पूजा आदि को रोक लेँ तो देवोँ को भोजन नहीँ मिलेगा । इससे उन्हे क्रोध होगा । अगर गाय का दूधारूपन रुक जाये तो उससे कोई लाभ नहीँ होगा । तुरन्त उसको घास या चारा देना बन्द करते है न? मनुष्य की इच्छाएँ सब अन्त हो तो वह ऐसी स्थिति मेँ आएगा कि उसे किसी भी देवता का अनुग्रह न हो । उसके लिए उसका आहुति देना भी बन्द होगा । मनुष्य का कर्म रुक जाये तो बाद देवताओँ को उससे कोई लाभ नहीँ होगा । इसी कारण पुराणोँ मेँ देखते हैँ कि जब कोई ऋषि ब्रह्मज्ञान पाने के लिए तपस्या करते थे तब देवता विध्न उपस्थित करते थे ।
इसीसे मुर्ख और अज्ञानी को " देवानांप्रियः " का नाम पड़ा है । देवानांप्रियः का अर्थ है देवोँ का प्यारा । वह स्तुति के शब्द जैसे लगेगा । अशोक चक्रवर्ति ने भी शिलालेखोँ और स्तूपोँ मेँ अपना वर्णन " देवानां प्रिय अशोक " अंकित कर लिया है । पर असल मेँ देवताओँ को तृप्त करने की स्थिति मेँ ज्ञान की खोज न करके कर्म मेँ ही जो मूर्ख उलझा है वही देवानांप्रियः है ।- पुराने समय मेँ ज्ञान प्राप्त लोग भी शास्त्र कर्म को छोड़ने मेँ झिझकते थे । दूसरोँ को मार्ग दर्शाने के लिए वे लोग , चाहे अपने लिए अनावश्यक क्योँ न हो , तो भी , निरन्तर कर्म किया करते थे । हमने तो जरा भी बिना झिझक के , खुशी से सकल शास्त्र धर्मो को छोड़ ही दिया है , पर ज्ञानी भी न बने ।
ज्ञानी नहीँ थे तो देवानांप्रियः होते तो देवोँ की प्रीति से हम मरने के बाद लोक जा सकते। देवलोक मनोरंजन का लोक है । वह मोक्ष नहीँ है , मेरे मित्र । मोक्ष आत्मानन्द शाश्वत रूप मेँ देता है जो इन्द्रियोँ से परे आनन्द से बढ़कर है । देव लोक वह लोक है जो हमेँ तब तक भोग्य सुख प्रदान करता है जब तक हमेँ वैदिक कर्म से प्राप्त पुण्य खर्च नहीँ होता । पुण्य के खतम होने पर हमेँ भूलोक ही लौटना पड़ेगा । मोक्ष सुख और देवलोक बनाम स्वर्ग सुख के बीच अजगजान्तर है यानी आकाश - पाताल का अन्तर है। फिर भी दुःख व कष्ट से मनुष्य लोक से कम - से - कम देवलोक पहुँचे तो वह श्रेष्ठ ही है , मेरे भैया । क्या हम उसके लिए मार्ग बना रहे हैँ ? वह भी नहीँ है । देवोँ को तृप्ति देनेवाले वैदिक कर्मो को छोड़ने के बाद हम कैसे उनको प्यारे लगेँगे ? हम " नरकानांप्रिय" ही बने है - हम ऐसी स्थिति मेँ हैँ कि नरकवासी ही हमारे साथी के रूप मेँ आएंगे और वे ही हमेँ अपने प्यारे मानेँगे । दुष्ट रहने से मूर्ख रहना उत्तम है । पहले हमेँ मूर्ख देवानांप्रिय बनना चाहिए । बाद " पशुपति " थोड़ा - थोड़ा करके बन्धन को खोल देँगे । देवलोक की इच्छा , कर्म के प्रति आसक्ति - इन दोनोँ के बिना कर्म करेँ तो वह कर्म ही शुद्धि देकर ज्ञान की मार्ग की नीँव ड़ालेगा । बाद मेँ हम ऐसे ज्ञानी सकेँगे जो देवोँ के प्यार और धृणा की परवाह न करेँ । तब पशु ( जीव ) - पाश ( रस्सी - बन्धन) - पति ( ईश्वर) आदि तीनोँ मेँ पशु व पाश मिटकर पति मात्र रहेगा । हम पशु ही पति के रूप मेँ रहेँगे । शैव सिद्धान्त मेँ पति - पशु - पाश के नाम से जो कहा जाता है वही भगवान श्रीआद्य शङ्करभगवत्पादचार्य के अद्वैत वेदान्त मेँ जीव - ब्रह्म - माया कहा जाता है । आचार्य शङ्कर नेँ भी पशु - पाश के शब्दोँ का प्रयोग " सौन्दर्यलहरी " के श्लोक मेँ किया है । श्लोक इस प्रकार है -
" चिरं जीवन्नेव क्षपित पशु पाश व्यतिकरः ।
परानंदाभिख्य रसयति रसं त्वत्भजनवान् ।।
अर्थात् हे अंबिके । जो तुम्हारी पूजा करता है वह पशु - पाश आदि के मिलन से उत्पन्न कष्ट दूर करके सदा परमानन्द का रस लेता है ।
शिव । शिव ।।
" महावाक्याणि "
                                      
                                    
                                    

                                      " महावाक्याणि "

              
नारायण । " महाश्रोत्रिय " , " महायात्रा " " महाप्रस्थान " , " महाज्ञानी " आदि जैसे शब्द हैँ , वैसा ही श्रुति महावाक्य " है । इसका एक यह भी अर्थ हो सकता है कि - जिससे बड़ा , जिससे व्यापक अर्थ वाला कोई अन्य वाक्य नहीँ हो सकता । दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि - जिसके पश्चात् दूसरा वाक्य बोलना ही पड़ता हो । या योँ कहे कि बोलने की आवश्यता ही न रह जाती हो । जो प्राणी दिन - रात बहिर्मुख बने रहते हैँ , जो प्राणी आठो प्रहर इन्दियद्वारोँ पर ही डटे रहते है , उनमेँ से जब कीसी नाटक के नटोँ या पालतू तोते - मैनाओँ के समान इन महावाक्योँ को बोल उठे तो उसकी बात हम नहीँ कहते हैँ । हम तो केवेल उन  महामना - महामुनियो.की ओर को संकेत करना चाहते हैँ , जिनके हृदयधाम मेँ धधकती हुई ज्ञानाग्नि की ज्वाला मेँ सृष्टि के पदार्थोँ की स्वाधिन सत्ता सरकण्डे की रूई के समान भड़भड़ा कर भस्म हो चुकी हो । वे जब एकान्त हृथय मन्दिर के मौनप्रदेश मेँ बैठकर इन वाक्योँ को बोल बैठते हैँ और जब उनके हृदय - प्रदेश मेँ सदा के लिये सन्नाटा छा जाता है - जिसके बाद एक भी अन्ववर्थ वाक्य ऐसा सुनाई नहीँ पड़ सकता जो उनके उस गंभीर सन्नाटे को कभी भी भंग कर सकता हो , तब इन वाक्योँ को  " महावाक्य " कहना बड़े ही गौरव की बात प्रतीत होती है । श्रुति न जिन महावाक्यो को गान की है वे सभी प्राणीयोँ के अन्दर गुप्तभाव से रहने वाले " पूण अहं " का वर्णन करने वाला है । क्षुद्र अहं ने जीवात्माओँ को संकुचित कर रक्खा है । विचार की आँच से जब क्षुद्र अहं जल जाता है तब वही पूर्ण अहं प्रत्यक्ष दर्शन दे देता है । आँख का पलक खुलते ही जैसे अनन्त आकाश आँखोँ के सामने आ खड़ा होता है इसी प्रकार क्षुद्र अहं को हटाते ही अनन्त आत्मतत्व साधक को दीखने लग पड़ता है । उसी पुण्यकीर्ति अवस्था की ओर संकेत करने वाले ये " महावाक्य" हैँ । जितने भी वेदादि सद्शास्त्र है वे इसी पूर्ण अहं की ध्वनियाँ है , आवाज़े हैँ । मनन के सागर मेँ गहरे उतरे हुये लोगौँ को ही ऐसी ईश्वरीय आवाज़ेँ सुनाई पड़ा करती हैँ । इसी कारण वेदोँ को " अपौरुषेय " कहा जाता है । वेदोँ को कोई पुरुष बनाता नहीँ किन्तु ये तो शुद्ध मन से सुनने की बाते हैँ । इसीलिये वेदोँ को ऋषियोँ द्वारा प्रकट होना बताया जाता है । महावाक्योँ की मृतप्राय आवाजेँ जनसाधारण के हृदय मेँ भी सुनाई तो पड़ती है , परन्तु वे अपने क्षुद्र अहंकार के परवश होने के कारण इनको अनसुनी कर देते हैँ । सभी प्राणी अपने जी मेँ अपने आपको बड़े से बड़ा और अच्छे से अच्छा मानते हैँ । सभी को अपना आपा सर्वगुणसम्पन्न और सबसे अच्छा प्रतीत है । सभी अवसर पाते ही अपनी बड़ाई बघारने से चुकते नहीँ हैँ । परन्तु ऐसी सर्वहृदयेश्वरी महत्ता का जो गुप्त कारण है उसका किसी को पता नहीँ है । " नारायण " ! हम तो इसी गुप्त महत्ता को ही सोया पड़ा हुआ " अहँ ब्रह्मास्मि " कहते है । अन्दर जो निःशब्द भाषा मेँ " अहं ब्रह्मास्मि " की अखण्ड रटना चल रही है , उसी से यह प्राणी अपने को सर्वोत्तम समझ रहा है । हमारे रोम - रोम मेँ " अहं ब्रह्मास्मि " यह महामन्त्र समाया हुआ है । मौत ने सारे संसार को अपने जबड़े मेँ दबा रखा है परन्तु उस मौत को भी निगल जाने वाला यह अन्दर का " अहं ब्रह्मास्मि " कभी मरना जानता ही नहीँ । इस अन्दर के " अहं ब्रह्मास्मि " को इस मांस की चादर ने लपेट रखा है । अब तो हमेँ क्षुद्र देहाभिमान के रूप मेँ इस " अहं ब्रह्मास्मि " की निर्बल ( मुर्दा ) आवाज़ कभी कभी सुनाई पड़ जाती है । अब इसमेँ ब्रह्मतेज नहीँ रह गया है । अन्दर के इस " अहं ब्रह्मास्मि " को - सोय पड़े हुये इस ॐ को हम साधकोँ को धीरतापूर्वक जगाना पड़ेगा । जब यह पूरा पूरा जाग उठेगा और इस मांस की चादर को तोड़ फोड़ डालेगा , तब यह देहाभिमान को , क्षुद्र अहंकार को जलाकर राख कर देगा । देहाभिमान के जलने का बहाना पाकर यही " अहं ब्रह्मास्मि " फिर ब्रह्माण्ड भर मेँ फैल जायेगा और इस अनन्त ब्रह्माण्ड पर फिर अपना एकछत्र आधिपत्य जमा लेगा । ऐसी दिव्य अवस्था जब आ जाती है तब ही " अहं ब्रह्मास्मि " आदि महावाक्योँ के बोलने का सच्चा अधिकार प्राप्त होता है । नहीँ तो कोरे शाब्दिक ( शास्त्रीय ) ज्ञान से कुछ भी होने वाला नहीँ है । गुड़ कहने मात्र से किसी का मुह मीठा नहीँ हो जाता है - राम राम रटने से तोता मुनि नहीँ हो जाता है । ऐसी दिव्य अवस्था जब आती है तब शान्ति का अनन्त समुद्र उमड़ पड़ता है । तब शोक , भय , दीनता आदि ठहर नहीँ पाते हैँ । जिन लोगोँ के पवित्र मानस मेँ इस तरह के " अपौरुषेय" महावाक्य सुनाई पड़ने लगते हैँ , जिनके हूदय मेँ पूर्णता की गुंजार रहने लग जाती है , वे ही मुनि हैँ , वे ही जीवनमुक्त हैँ , उनको ही विदेह मुक्ति का  मिल सकती है । जिसकी वाणी के पीछे अनुभव का बल नहीँ होता है ऐसी निस्तेज वाणी से बोले हुए " अहं ब्रह्मास्मि " आदि महावाक्य उसी तरह बन्धनकारक होते हैँ , जिस प्रकार अन्य अपशब्द बन्धनकारक होते हैँ। क्योँकि अनुभव रहित पुरुष जब इन महावाक्योँ को कहते हैँ तब वे आत्मघात कर बैठते है क्योँकि उनमेँ दम्भ आदि दोष बहुतायत से उत्पन्न हो जाते हैँ ।
मुख्य महावाक्य चार हैँ -
( 1 )  - " अहं ब्रह्मास्मि " , ( 2 ) - " प्रज्ञानं ब्रह्म "  , ( 3 ) - " तत्त्वमसि " ,   ( 4 ) - " अयमात्मा ब्रह्म "  ।  ब्रह्म और आत्मा की एकता रूप जो मोक्ष का साधन है- उसका ज्ञान इन या इन जैसे वाक्योँ से ही हो पाता है । आत्मा सच्चिदानन्द स्वरूप है , यह ज्ञान तो युक्ति से भी हो जाता है । परन्तु यह आत्मा और वह ब्रह्म तत्त्व दोनोँ एक ही तत्त्व है , इस बात जानने का उपाय शब्द प्रमाण के अतिरिक्त और कुछ भी नही है ।
" येनेक्षते श्रृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च
स्वाद्वस्वादू विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम् ।। "
 प्रज्ञानं ब्रह्म " चक्षु और श्रोत्र के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है , उस वृत्ति से उपहित जो चैतन्य किंवा ज्ञान है , उसी से तो यह संसार रूपादि पदार्थोँ को देखा करता है और शब्दोँ को सुना करता है । नासिका के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति जो बाहर निकलती है अन्तःकरण की उस वृत्ति से उपहित जो चैतन्य किँवा " प्रज्ञान " है , उसी " प्रज्ञान " से तो यह संसार भले - बुरे गन्दोँ को सूँघा करता है । वागिन्द्रय से ढके हुए उसी चैतन्य किँवा " प्रज्ञान " से ये सब शब्द बोले जाते हैँ ।
रसना के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है , उसको जिस चैतन्य अपनी उपाधि बना लिया है , उसी से तो ये स्वादु या अस्वादु रस पहचाने जाते हैँ । इतना ही नहीँ और भी इन्दियोँ तथा अन्तःकरण की वृत्तियोँ से जिस चैतन्य किँवा जिस " प्रज्ञान की सूचना जब - तब मननशील पुरुष को मिला करती है उसी को आचायोँ ने " प्रज्ञान " कहा है । ब्रह्मा , विष्णु , इन्द्र , देवता , मनुष्य तथा पशु - पक्षियोँ मेँ यही " प्रज्ञान " व्याप्त हो रहा है । वेदादि - शास्त्र सभी इसी " प्रज्ञान - सुर्य " की बिखरी हुई किरणे हैँ। इसी के सहारे से जगत् के जन्म , स्थित और प्रलय हो रहे हैँ - इस कारण कहना पड़ रहा कि " सर्वान्तर्वासी " यह " प्रज्ञान " ही " ब्रह्मतत्व " है । क्योँकि सर्वत्र व्याप्त यह " प्रज्ञान " ही ब्रह्म है , इसी से मैँ मुमुक्षु अब यह बात बेधड़क होकर कह रहा हूँ कि मुझ मेँ जो " प्रज्ञान " है वह भी " ब्रह्मतत्व " ही है । आज से मैँ इस " महामहिम - प्रज्ञान " पर झूठा अहंकार ( क्षुद्र अहंकार ) करना छोड़ देता हूँ । इतना जानने पर भी यदि मैँ इस सर्वत्र व्याप्त " प्रज्ञान " पर क्षुद्र अहंकार करूँगा तो मैँ " ब्रह्मद्रोही " हो जाऊँगा । व्यापक ब्रह्म को " क्षुद्र अहम् " मेँ परिच्छिन्न करने का " घोर पातक " मुझे लगेगा।
" अहं ब्रह्मास्मि " योँ सिद्धान्तरूप से तो सभी देहोँ मेँ वह परमतत्व परिपूर्ण हो रहा है और सभी की बुद्धियो का साक्षी भी है । सभी प्राणी अपने को सबसे बड़ा और सबसे गुणी मान कर " अहं ब्रह्मास्मि " की रटन अज्ञानपूर्वक करते ही रहते हैँ । परन्तु इतने मात्र से साधक का कुछ भी उपकार नहीँ हो पाता । जब तो किसी साधक को उसके साथ ही यह स्फूर्ति अथात् प्रतीति भी हो जाय कि वह सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्व ही मेरी बुद्धि का साक्षी है , तो वैसे स्फुर्तियुक्त आत्मा के विस मेँ ही हम " अहम् " ( मैँ ) शब्द कह रहे है । जब कोई साधक अपने उपर पड़ी हुई अविद्या की चादर को बार - बार उतार कर फेँकने लगता है , जब कोई साधक मांस के झोँपड़े मेँ से निकल कर बाब - बार बाहर बैठने लगता है , तब उस साधक को ही हम " अहम् " ( मैँ ) कहना चाहते हैँ । देश काल या वस्तु परिच्छिन्न मेँ न आने वाली स्वभाव से ही परिपूर्ण वस्तु है वह " ब्रह्म " कही जाती है । इस " मैँ " को और उस " ब्रह्म " को परस्पर एक बता देना " अस्मि " इस तीसरे पद का काम है । जिसका भाव यही होता है कि " मैँ " अर्थात् साधक " ब्रह्मतत्व " ही हूँ अथवा मैँ साधक ही तो ब्रह्म हूँ । अविद्या के प्रताप से जो मैँ अपने आपको संसारी आदि मान बैठा था वह भी मैँ नहीँ हूँ । देहेन्द्रियादि के साथ जल मरने वाला क्षुद्र प्राणी मैँ कदापि नहीँ हूँ । अथवा अविद्या के प्रताप से जो मैँ " ब्रह्मतत्व " को अपने से पृथक् - सातवे आसमान पर रहने वाला - तत्व मान बैठा था वह " ब्रह्मतत्व " मुझसे पृथक् पदार्थ नहीँ है ।
" तत्त्वमसि " जो अभी तक वृथा ही ( न मालूम क्योँ ) शरीरोँ के वेष्टनो से लिपटा पड़ा था , जो शरीर के साथ वृथा ही बार - बार मर और जी रहा था , श्रवणादि का अनुष्ठान करके महावाक्य की समझने की योग्यता अब इसमेँ आ गयी है , जो तीनोँ देहोँ अर्थात् तीनोँ पुरोँ से अलग रहने लगा है , जो तीनोँ देहोँ के साक्षि की हैसियत मेँ आ गया है , उसी को हम " लक्षणावृत्ति " से " त्वं " अर्थात् " तू " कह रहे हैँ । सृष्टि बनने से पूर्व सम्पूर्ण भेदोँ से रहित जो एक नामरूप रहित वस्तु थी , सृष्टि बन जाने के बाद अब भी जो वस्तु वैसी की वैसी ही है , जिस सद्वस्तु मेँ अब भी कोई विकार नहीँ आया है , उसी निर्विकार सद्वस्तु को हम " लक्षणावृत्ति " से " तत् " अर्थात् " वह " कह रहे हैँ । इन दोनो शब्दोँ के लक्ष्यार्थोँ की जो छिपी हुई एकता है , उसी गुप्त एकता का ग्रहण " असि" ( है ) यह पद करा रहा है । परन्तु कितना भी प्रयत्न करे इस लक्ष्यार्थ तक तो केवल अधिकारी लोँगोँ की ही उदार दृष्टी पहुँचेगी । दूसरे अनाधिकारी लोग तो इस महावार्ता को हँसी - ठिठोली मेँ टाल देँगे और परम पद के साथ खिलबाढ़ कर बैठेँगे । मुमुक्षु साधकोँ को चाहिये कि " तत् " " त्वं " पदोँ की जो एकता प्रमाणपुष्ट हो चुकी है , उसका दिव्यानुभव वे भी ले लेँ , और वैसा अनुभव करके अनादि काल की इस वृथा खटपट को भूल जाँय । वे अनुभव करेँ कि क्या हम अनादि काल से इसी " भवजाल " मेँ उलझे रहने को यहाँ उतरे हैँ ? क्या इस संसार की बेमतलब उखाड़ - पछाड़ ही हमारे इस जीवन का चरमलक्ष्य है ? या हमारा अपना कोई स्थाई रूप भी है ? जिसके आधार से हमको शान्ति के सुखद दर्शन मिल सकते हैँ । इसी गंभीर प्रश्न का उत्तर " तत्त्वमसि " ( तुम तो वह हो ) आपको खटपट की कुछ भी आवश्यकता नहीँ है । यह " तत्त्वमसि " महावाक्य आपको संकेत कर रहा है ।
" अयमात्मा ब्रह्म " जो तत्व स्वयंप्रकाश होने के कारण ही यद्यपि सबको प्रत्यक्ष हो रहा हैफिर भी मायामोहित प्राणी ने इस स्वयंप्रकाशतत्व की भी ऐसी अपेक्षा की है जैसी कदाचित् कदाचित् शत्रुओँ की भी कोई न करता हो । कोटिजन्मोँ के पुण्योँ के परिपाक से जब किसी साधक की सूक्ष्म दृष्टि उस तत्व तक जा पहुँचे तब सूक्ष्म दृष्टि से पकड़ लिये हुए उसी तत्व को हम " अयम् ( यह) कह रहे हैँ - अर्थात् यह तत्व कभी किसी से छिपता नहीँ है और यह कभी किसी का दृश्य नहीँ नहीँ होता है । अहंकार , प्राण , मन , इन्द्रिय तथा देह का जो समुह है , उस सभी का अधिष्ठान , सभी का साक्षी , सभी से प्रत्यक् , सभी से आन्तर , जो कोई तत्व है उसी को हम आत्मा कहते हैँ। यह जो आकाशादि संसार हमेँ दिख रहा है यह सब क्षणभंगुर है । यह क्षणभंगुर संसार अपने स्वभाव के अनुसार जब शेष नहीँ रह जायगा , तब जो तत्व शेष बचेगा उस तत्व को हम " ब्रह्म " कहते हैँ ।  वह ब्रह्मतत्व साधक की समझ मेँ आया हुआ स्वयं प्रकाश आत्मा ही तो है । इस आत्मा से भिन्न कोई ब्रह्मनाम का पदार्थ होता होगा यह विचार प्रमाणानुमोदित नहीँ है । इस आत्मा से भिन्न किसी को ब्रह्म समझना भारी से भारी भूल है ।
श्री नारायण हरिः ।