Saturday, January 29, 2011


    
दिव्य प्रदोषस्तोत्रम
श्री गणेशाय नमः ।
जय देव जगन्नाथ जय शंकर शाश्वत ।
जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ।। 1 ।।
जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद ।
जय नित्य निराधार जय विश्वम्भराव्यय ।। 2 ।।
जय विश्वैकवन्द्येश जय नागेन्द्रभूषण ।
जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर ।। 3 ।।
जय कोट्यर्कसङ्काश जयानन्तगुणाश्रय ।
जय भद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरञ्जन ।। 4 ।।
जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभञ्जन ।
जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो ।। 5 ।।
प्रसीद मे महादेव संसारार्तस्य खिद्यतः ।
सर्वपापक्षयं कृत्वा रक्ष मां परमेश्वर ।। 6 ।।
महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च ।
महाशोकनिविष्टस्य महारोगातुरस्य च ।। 7 ।।
ऋणभार परीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः ।
ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शंकर ।। 8 ।।
दरिद्रः प्रार्थयेद्देवं प्रदोषे गिरीजापतिम ।
अर्थाढ्यो वाऽथ राजा वा प्रार्थयेद्देवमीश्वर ।। 9 ।।
दीर्घमायुः सदारोग्यं कोषबृद्धिर्वलोन्नतिः ।
ममास्तु नित्यमानन्दः प्रसादात्तव शङ्कर ।। 10 ।।
शत्रवःसंक्षयं यान्तु प्रसीदन्तु मम प्रजाः ।
नश्यन्तु दस्यवो राष्ट्रे जनाः सन्तु निरापदः ।। 11 ।।
दुर्भिक्षमरिसन्तापाः शमं यान्तु महीतलेः ।
सर्वसस्यसमृद्धिश्च भुयात्सुखमया दिशः ।।12 ।।
एवमाराधयेद्देवं पूजान्ते गिरीजापतिम् ।
ब्राह्मणान्भोजयेत् पश्चाद्दक्षिणाभिश्च पूजयेत् ।। 13 ।।
सर्वपापक्षयकरी सर्वरोगनिवारणी ।
शिवपूजा मयाऽऽख्याता सर्वाभीष्टफलप्रदा ।। 14 ।।
।। इति दिव्य प्रदोषस्तोत्रम सम्पूर्णम् ।।
*
श्री नारायण हरिः ।।

Wednesday, September 15, 2010

प्रभुके प्रेम के लिए , पूरी तैयारी चाहिए

ऐसा न हो कि मेघ आएं , बरसेँ और चले जाय ।
तुम सूखे के सूखे ही जाओ ।
तुम्हारी तैयारी चाहिए ।
स्वीकार का भाव चाहिए ।
प्यास चाहिए , तड़पन चाहिए ।
चातक की भांति मुँह खोल के आकाश की तरफ प्रार्थना से भरा हृदय चाहिए ।
आकाश की तरफ उठा होना चाहिए ।
प्रतीक्षातुर होना चाहिए ।
तब कही स्वांति की बूंद तुम्हारे मुंह मेँ गिरेगी ।
गी । प्रेम - बरसता हैँ -
जैसे दीये से रोशनी फैलती है ।
जैसे फूल से गन्ध बहती है ।
अगर तुम तैयार हो , तो तुम प्रेम से भर सकते हो ।
तुम्हारे अंग - अंग मेँ रोशनी भर सकती है ।
तुम्हारे नासापुर गन्ध से सराबोर हो सकते हैँ ।
तुम सब कुछ पा सकते हो ।
तुम सब कुछ लूट सकते हो ,
तुम सम्राट हो सकते हो ,
तुम शाहंशाह बन सकते हो ।
तुम पर निर्भर करता है ।
तुम्हारी पात्रता चाहिए ।
तुम्हारी योग्यता चाहिए ।
तुम्हारी बेचैनी चाहिए ।
परमात्मा का प्रेम पाने के लिए ।
श्रीमन्न नारायण नारायण हरि हरि ।।

श्री गंगा जी के तट पर ..

श्री गंगा जी के तट पर ....
*
धुंध और बादलोँसे भरा सुन्दर प्रभात था । ठंढी हवा चल रही थी । नन्हे- नन्हे ओस कणोँसे पृथ्वी भीग गयी थी । सर्दियोँकी सुबह थी । मीठी महीन स्वर लहरीके साथ गँगा मन्द गतिसे बह रही थी । गंगाकी पतली महीन धार चाँदीके फीतेकी के भाँति चमक रही थी । एक दिव्य आनन्द और शान्तिकी वर्षा हो रही थी ।
कितनी सुखद और शान्ति पूर्ण सुबह थी ।

मैँ गंगा के तट पर बैठा था । वातावरण इतना शान्त और एकान्त था , कि कुछ कहने - सुनने की स्थिति मे नहीँ था । वाणी मूक थी । दिमाग शान्त था । हृदय गति इतनी धीमी हो गयी थी लगता था मानो हृदय रुक गया है । सांस स्थिर हो गये हैँ । शून्य , एक दम शून्य ।
समाधिका - सा अनुभव । स्थित - प्रज्ञ की सी स्थिति ।
ब्राह्मी स्थितिका सा आनन्द ।
सब कुछ भूल गया था ।
सब कुछ छुट गया था ।
सब कुछ खो गया था ।
सब कुछ बह गया था ।

पहले आँखे खुली थी , फिर बन्द हो गयी । फिर पता नही क्या हुआ ? जागने पर पता चला गंगा तट पर हूँ । क्या सो गया था ? नहीँ । क्या जाग रहा था ? क्या अर्धनिद्रा मेँ था ? नहीँ । अक्सर था क्या ? क्या कहूँ क्या था ? कहने सुननेके परे था । सोने - जागने के
अतिरिक्त था । कुछ नहीँ और सब कुछ था । इस स्थितिको भाषा और शब्द बाँध नही सकते । खुली आँखेँ जो कुछ नजर आता है वह " दृश्य " है । बन्द आँखे जो देखती है ; वह द्रष्टा है । बाहर जगत है , अन्दर जगदीश्वर । बाहर प्रकृति है , भीतर परमात्मा ।

जय जय शंकर हर हर शंकर ।।