Wednesday, September 15, 2010

प्रभुके प्रेम के लिए , पूरी तैयारी चाहिए

ऐसा न हो कि मेघ आएं , बरसेँ और चले जाय ।
तुम सूखे के सूखे ही जाओ ।
तुम्हारी तैयारी चाहिए ।
स्वीकार का भाव चाहिए ।
प्यास चाहिए , तड़पन चाहिए ।
चातक की भांति मुँह खोल के आकाश की तरफ प्रार्थना से भरा हृदय चाहिए ।
आकाश की तरफ उठा होना चाहिए ।
प्रतीक्षातुर होना चाहिए ।
तब कही स्वांति की बूंद तुम्हारे मुंह मेँ गिरेगी ।
गी । प्रेम - बरसता हैँ -
जैसे दीये से रोशनी फैलती है ।
जैसे फूल से गन्ध बहती है ।
अगर तुम तैयार हो , तो तुम प्रेम से भर सकते हो ।
तुम्हारे अंग - अंग मेँ रोशनी भर सकती है ।
तुम्हारे नासापुर गन्ध से सराबोर हो सकते हैँ ।
तुम सब कुछ पा सकते हो ।
तुम सब कुछ लूट सकते हो ,
तुम सम्राट हो सकते हो ,
तुम शाहंशाह बन सकते हो ।
तुम पर निर्भर करता है ।
तुम्हारी पात्रता चाहिए ।
तुम्हारी योग्यता चाहिए ।
तुम्हारी बेचैनी चाहिए ।
परमात्मा का प्रेम पाने के लिए ।
श्रीमन्न नारायण नारायण हरि हरि ।।

श्री गंगा जी के तट पर ..

श्री गंगा जी के तट पर ....
*
धुंध और बादलोँसे भरा सुन्दर प्रभात था । ठंढी हवा चल रही थी । नन्हे- नन्हे ओस कणोँसे पृथ्वी भीग गयी थी । सर्दियोँकी सुबह थी । मीठी महीन स्वर लहरीके साथ गँगा मन्द गतिसे बह रही थी । गंगाकी पतली महीन धार चाँदीके फीतेकी के भाँति चमक रही थी । एक दिव्य आनन्द और शान्तिकी वर्षा हो रही थी ।
कितनी सुखद और शान्ति पूर्ण सुबह थी ।

मैँ गंगा के तट पर बैठा था । वातावरण इतना शान्त और एकान्त था , कि कुछ कहने - सुनने की स्थिति मे नहीँ था । वाणी मूक थी । दिमाग शान्त था । हृदय गति इतनी धीमी हो गयी थी लगता था मानो हृदय रुक गया है । सांस स्थिर हो गये हैँ । शून्य , एक दम शून्य ।
समाधिका - सा अनुभव । स्थित - प्रज्ञ की सी स्थिति ।
ब्राह्मी स्थितिका सा आनन्द ।
सब कुछ भूल गया था ।
सब कुछ छुट गया था ।
सब कुछ खो गया था ।
सब कुछ बह गया था ।

पहले आँखे खुली थी , फिर बन्द हो गयी । फिर पता नही क्या हुआ ? जागने पर पता चला गंगा तट पर हूँ । क्या सो गया था ? नहीँ । क्या जाग रहा था ? क्या अर्धनिद्रा मेँ था ? नहीँ । अक्सर था क्या ? क्या कहूँ क्या था ? कहने सुननेके परे था । सोने - जागने के
अतिरिक्त था । कुछ नहीँ और सब कुछ था । इस स्थितिको भाषा और शब्द बाँध नही सकते । खुली आँखेँ जो कुछ नजर आता है वह " दृश्य " है । बन्द आँखे जो देखती है ; वह द्रष्टा है । बाहर जगत है , अन्दर जगदीश्वर । बाहर प्रकृति है , भीतर परमात्मा ।

जय जय शंकर हर हर शंकर ।।

श्री गुर पादुका पंचकम् ( श्री आद्य शंकराचार्य विरचित )

* गुरु पादुका पंचकम् *
जगज्जनिस्थेम -लयालयाभ्यां, अगण्य पुण्योदय भाविताभ्याम् ।
त्रयीशिरोजात निवेदिताभ्यां, नमो नमः श्री गुरुपादुकाभ्याम् ॥1॥
विपत्तमस्तोम विकर्तनाभ्यां, विशिष्ट संपति विवर्धनाभ्याम् ।
नमज्जनाशेष विशेषदाभ्यां, नमो नमः श्री गुरुपादुकाभ्याम् ॥2॥
समस्तदुस्तर्क कलड्क पड्का -पनोदन प्रौढ जलाशयाभ्याम् ।
निराश्रयाभ्यां निखिलाश्रयाभ्यां, नमो नमः श्री गुरुपादुकाभ्याम् ॥3॥
तापत्रयादित्य करार्दितानां, छायामयीभ्यां अतिशीतलाभ्याम् ।
आपन्नसंरक्षण दीक्षिताभ्यां, नमो नमः श्री गुरुपादुकाभ्याम् ॥4॥
यतो गिरोऽप्राप्य धिया समस्ता, हिया निवृत्ताः सममेव नित्याः।
ताभ्यामजे शाच्युत भाविताभ्याम् , नमो नमः श्री गुरुपादुकाभ्याम् ॥5॥
ये पादुकापञ्चक मादरेण, पठन्ति नित्यं प्रयताः प्रभाते,
तेषां गृहे नित्यनिवासशीला , श्री देशिकेन्द्रस्य कटाक्षलक्ष्मीः ॥6॥

आँखेँ खोलो ॥

कहाँ दौड़ रहे हो ?
कहाँ भाग रहे ?
कहाँ भटक रहे हो ?
कहाँ माथा पटक रहे हो ?
कहाँ रेत पर महल बना रहे हो ?
कहाँ इन्द्र - धनुषके स्वप्न देख रहे हो ?
तुम नशे मेँ हो , तुम बेहोशीमेँ हो ।
तुम काँप रहे हो ,
तुम्हारे पैर डगमगा रहे हैँ ,
तुम जो कुछ कर रहे हो ,
बेहोशी मेँ कर रहे हो ।
जितना जल्दी हो सके जाग जाओ ,
वर्ना तुम्हारी पीड़ा बढ़ती जाएगी ,
तुम्हारी व्यथा फैलती जाएगी ,
तुम्हारी बीमारी असाध्य होती जाएगी ।
तुम उठो , जागो ,
तुम जाओ उनके पास , जो जागे हुए है ।

अमृत विन्दु ...

अमृत विन्दु ।
* एक नियम ग्रहण करेँ जीवनमेँ और कष्ट उठाकर भी उसका पालन करेँ । तब तपस्या हो जायगी ।
दुश्चरित्रताकी निवृतिके लिए धर्म को धर्म को धारण करेँ , वासनाकी निवृत्तिके लिए उपासना करेँ । राग - द्वेषकी निवृतिके लिए भक्ति करेँ । अभिमानके निवृतिके लिए शरणागति लेँ । अज्ञानकी निवृतिके लिए ज्ञान मार्ग पर चलेँ ।
* अज्ञान क्या है ? अपनेसे दूर किसी वस्तुको ढूँढना , उसका आदि - अन्त ढुँढना - दिशामेँ , वस्तुमेँ -यह बिल्कुल अज्ञान है । तब ज्ञान कहाँ है ? आप जहाँ बैठे हैँ बहीँ से आपका पूर्व शुरु होता है । हमारे दाहिने पूर्व है तो हमारे बायेँ पश्चिम है ।
* जब आप बाहर ढूँढने जायेँगे तो कहीँ आदि - अन्त नहीँ मिलेगा और जब अपने पास लौट आवेँगे तो इनका आदि - आपको अपने आप मिल जायेगा ।
* ईश्वरकी शरणागतिका अर्थ है - पूर्व , पश्चिम , उपर - निचे भटकना नही , अपने घर मेँ आजाना ।
* बात - बातमेँ तो चिढ़ते हैँ आप शान्ति कहाँसे मिलेगी , चिढ़ना छोड़देँ शान्ति आपके आगे खड़ी है । अपने मनकी तो जिद्द किये बैठेँ है , आपको शान्ति कहाँसे मिलेगी , जिद्द छोड़देँ शान्ति आपके पास खड़ी है । दूसरे को तो आप बेबकुफ समझते हैँ अपनेको समझदार समझते है आपको शान्ति कहाँसे मिलेगी ? आत्म निरिक्षण बाली जो दृष्टि है बह हमारे जीवन मेँ आनी चाहिए ।
नारायण । नारायण ।।
हरि । हरि ।।

श्रीमद्शंकराचार्य अष्टोत्तरशत् नामावलि :-

।।श्रीमद्शंकराचार्य अष्टोत्तरशत् नामावलि : ।।
+
.. श्री शंकराचार्य अष्टोत्तरशत नामावलिः .. श्रीशंकराचार्यवर्यो ब्रह्मानन्दप्रदायकः | अज्ञान तिमिरादित्यस्सुज्ञानाम्बुधि चन्द्रमाः || १|| १) ॐ श्री शंकराचार्यवर्याय नमः २) ॐ ब्रह्मानन्दप्रदायकाय नमः . ३) ॐ अज्ञानतिमिरादित्याय नमः . ४) ॐ सुज्ञानाम्बुधिचन्द्रमसे नमः वर्णाश्रमप्रतिष्टाता श्रीमान्मुक्तिप्रदायकः | शिष्योपदेशनिरतो भक्ताभीष्टप्रदायकः || २|| ५) ॐ वर्णाश्रमप्रतिष्ठात्रे नमः ६) ॐ श्रीमते नमः ७) ॐ मुक्तिप्रदायकाय नमः ८) ॐ शिष्योपदेशनिरताय नमः . ९) ॐ भक्ताभीष्टप्रदायकाय नमः सूक्ष्मतत्त्वरहस्यज्ञः कार्याकार्यप्रबोधकः | ज्ञानमुद्राञ्चितकरश्शिष्यहृत्तापहारकः || ३|| १०) ॐ सूक्ष्म-तत्त्व-रहस्य-ज्ञाय नमः ११) ॐ कार्याकार्यप्रबोधकाय नमः . १२) ॐ ज्ञान-मुद्राञ्चितकराय नमः १३) ॐ शिष्यहृत्तापहाराकाय नमः "तापत्रयाग्नि संतप्त साम्ह्लादन चन्द्रिका", परिव्राजाश्रमोद्धर्ता सर्वतन्त्रस्वतन्त्रधीः | अद्वैतस्थापनाचार्यस्साक्षाच्छंकररूपभृत् || ४|| १४) ॐ परिव्राजाश्रमोद्धर्त्रे नमः . १५) ॐ सर्वतन्त्रस्वन्त्रधिये नमः . १६) ॐ अद्वैत-स्थापनाचार्याय नमः.१७) ॐ साक्षाच्छंकररूपभृते नमः भव एव भवा निति मे नितरं समजायत चेतसि कौतिकिता मम वारय मोह महाजलधिं भव शंकर देशिकमे शरणम् शंकर शंकर साक्षाद् नारायण स्वयम् | तयोर् विवादे संप्राप्ते किंकरः किं करोम्यहम् || षण्मतस्थापनाचार्यस्त्रयीमार्ग प्रकाशकः | वेदवेदान्ततत्त्वज्ञो दुर्वादिमतखण्डनः || ५|| १८) ॐ षण्मतस्थापनाचार्याय नमः १९) ॐ त्रयीमार्गप्रकाशकाय नमः२०) ॐ वेदवेदान्ततत्त्वज्ञाय नमः . २१) ॐ दुर्वादिमतखण्डनाय नमः वैराग्यनिरतश्शान्तस्संसारार्णवतारकः | प्रसन्नवदनाम्भोजः परमार्थप्रकाशकः || ६|| २२) ॐ वैराग्यनिरताय नमः २३) ॐ शान्ताय नमः . २४) ॐ संसार्णवतारकाय नमः . २५) ॐ प्रसन्नवदनाम्भोजाय नमः २६) ॐ परमार्थप्रकाशकाय नमः पुराणस्मृतिसारज्ञो नित्यतृप्तो महाञ्छुचिः | नित्यानन्दो निरातंको निस्संगो निर्मलात्मकः || ७|| २७) ॐ पुराणस्मृतिसारज्ञाय नमः २८) ॐ नित्यतृप्ताय नमः . २९) ॐ महते नमः . ३०) ॐ शुचये नमः ३१) ॐ नित्यानन्दाय नमः . ३२) ॐ निरातंकाय नमः ३३) ॐ निस्संगाय नमः . ३४) ॐ निर्मलात्मकाय नमः निर्ममो निरहङ्कारो विश्ववन्द्यपदाम्बुजः | सत्त्वप्रधानस्सद्भावस्सङ्ख्यातीतगुणोज्ज्वलः || ८|| ३५) ॐ निर्ममाय नमः ३६) ॐ निरहङ्काराय नमः ३७) ॐ विश्व-वन्द्य-पदाम्बुजाय नमः . ३८) ॐ सत्त्वप्रधानाय नमः ३९) ॐ सद्भावाय नमः ४०) ॐ सङ्क्यातीतगुणोज्ज्वलाय नमः अनघस्सारहृदयस्सुधीस्सारस्वतप्रदः | सत्यात्मा पुण्यशीलश्च साङ्ख्ययोगविलक्षणः || ९|| ४१) ॐ अनघाय नमः ४२) ॐ सारहृदयसुधिये नमः . ४३) ॐ सारस्वतप्रदाय नमः I . ४४) ॐ सत्यात्मने नमः ४५) ॐ पुण्यशीलाय नमः ४६) ॐ साङ्ख्ययोगविलक्षणाय नमः तपोराशिर् महातेजो गुणत्रयविभागवित् | कलिघ्नः कालकर्मज्ञस्तमोगुणनिवारकः || १०|| ४७) ॐ तपोराशये नमः ४८) ॐ महातेजाय नमः . ४९) ॐ गुणत्रयविभागविते नमः ५०) ॐ कलिघ्नाय नमः . ५१) ॐ कालकर्मज्ञाय नमः ५२) ॐ तमोगुणनिवारकाय नमःभगवान्भारतीजेता शारदाह्वानपण्दितः | धर्माधर्मविभावज्ञो लक्ष्यभेदप्रदर्शकः || ११|| ५३) ॐ भगवते नमः ५४) ॐ भारतीजेत्रे नमः . ५६) ॐ धर्माधर्मविभावज्ञाय नमः ५७) ॐ लक्ष्यभेदप्रदर्शकाय नमः नादबिन्दुकलाभिज्ञो योगिहृत्पद्मभास्करः | अतीन्द्रियज्ञाननिधिर्नित्यानित्यविवेकवान् || १२|| ५८) ॐ नादबिन्दुकलाभिज्ञाय नमः ५९) ॐ योगिहृत्पद्मभास्कराय नमः ६०) ॐ अतीन्द्रिय ज्ञाननिधये नमः . ६१) ॐ नित्यानित्यविवेकवते नमः चिदानन्दश्चिन्मयात्मा परकायप्रवेशकृत् | अमानुषचरित्राढ्यः क्षेमदायी क्षमाकरः || १३|| ६२) ॐ चिदानन्दाय नमः . ६३) ॐ चिन्मयातमने नमः ६४) ॐ परकायप्रवेशकृते नमः ६५) ॐ अमानुषचरित्राढ्याय नमः . ६६) ॐ क्षेमदायिने नमः ) ॐ क्षमकारय नमः भव्यो भद्रप्रदो भूरि महिमा विश्वरञ्जकः | स्वप्रकाशस्सदाधारो विश्वबन्धुश्शुभोदयः || १४|| ६८) ॐ भव्याय नमः ६९) ॐ भद्रप्रदाय नमः ७०) ॐ भूरिमहिम्ने नमः ७१) ॐ विश्वरञ्जकाय नमः ७२) ॐ स्वप्रकाशाय नमः ७३) ॐ सदाधारय नमः . ७४) ॐ विश्वबन्धवे नमः७५) ॐ शुभोदयाय नमः विशालकीर्तिर्वागीशस्सर्वलोकहितोत्सुकः | कैलासयात्रसंप्राप्त चन्द्रमौलिप्रपूजकः || १५|| ७६) ॐ विशालकीर्तये नमः ७७) ॐ वागीशाय नमः ७८) ॐ सर्वलोकहितोत्सुकाय नमः . ७९) ॐ कैलासयात्रसंप्राप्त चन्द्रमौलिप्रपूजकाय नमः कांच्यां श्रीचक्र राजख्य यन्त्र स्थापन दीक्षितः | श्रीचक्रात्मक ताटङ्क तोषिताम्बा मनोरथः || १६|| ८०) ॐ कांच्यां श्रीचक्र राजख्य यन्त्र स्थापन दीक्षिताय नमः ८१) ॐ श्रीचक्रात्मक ताटङ्क तोषिताम्बा मनोरथाय नमः ब्रह्मसूत्रोपनिषद्भाष्यादिग्रन्थकल्पकः | चतुर्दिक्चतुराम्नायप्रतिष्ठाता महामतिः || १७|| ८२) ॐ ब्रह्मसूत्रोपनिषद्भाष्यादिग्रन्थकल्पकाय नमः . ८३) ॐ चतुर्दिक्चतुराम्नायप्रतिष्ठात्रे नमः. ८४) ॐ महामतये नमः .द्विसप्तति मतोच्छेत्ता सर्वदिग्विजयप्रभुः | काषायवसनोपेतो भस्मोद्धूळितविग्रहः || १८|| ८५) ॐ द्विस्पतति मतोच्छेत्त्रे नमः . ८६) ॐ सर्वदिग्विजयप्रभवे नमः ८८) ॐ भस्मोद्धूळितविग्रहाय नमः . ज्ञानत्मकैकदण्डाढ्यः कमण्डलुलसत्करः | गुरुभूमण्डलाचार्योभगवत्पादसंज्ञकः || १९|| ८९) ॐ ज्ञानत्मकैकदण्डाढ्याय नमः ९०) ॐ कमण्डलुलसत्कराय नमः ९२) ॐ भूमण्डलाचार्याय . ९३) ॐ भगवत्पादसंज्ञकाय नमः 20 व्याससंदर्शनप्रीतः ऋष्यशृङ्गपुरेश्वरः | सौन्दर्यलहरी मुख्य बहुस्तोत्र विधायकः || २०|| ९४) ॐ व्याससंदर्शनप्रीताय नमःशन्ंकरश्शंकरस्साअक्षाद्व्यासो नारायण स्वयम् | तयोर् विवादे संप्राप्ते किंकरः किं करोम्यहम् || ९५) ॐ ऋष्यशृङ्गपुरेश्वराय नमः ९६) ॐ सौन्दर्यलहरी मुख्य बहुस्तोत्र विधायकाय नमः 21 चतुष्षष्टिकलाभिज्ञो ब्रह्मराक्षसपोषकः | श्रीमन्मण्डनमिश्राख्यस्वयंभूजयसन्नुतः || २१|| ९७) ॐ चतुष्षष्टिकलाभिज्ञाय नमः . ९८) ॐ ब्रह्मराक्षसपोषकाय नमः . ९९) ॐ श्रीमन्मण्डनमिश्राख्यस्वयंभूजयसन्नुताय नमः तोटकाचार्यसम्पूज्य पद्मपादर्चिताङ्घ्रिकः | हस्तामलयोगिन्द्र ब्रह्मज्ञानप्रदायकः || २२|| १००) ॐ तोटकाचार्यसम्पूज्याय नमः १०१) ॐ पद्मपादर्चिताङ्घ्रिकाय नमः १०२) ॐ हस्तामलयोगिन्द्र ब्रह्मज्ञानप्रदायकाय नमः सुरेश्वराख्य सच्छिष्य सन्यासाश्रम दायकः | नृसिंहभक्तस्सद्रत्नगर्भहेरम्बपूजकः || २३|| १०३) ॐ सुरेश्वराख्य सच्छिष्य सन्यासाश्रम दायकाय नमः १०४) ॐ नृसिंहभक्ताय नमः १०५) ॐ सद्रत्नगर्भहेरम्बपूजकाय नमः व्याख्यसिंहासनाधीशो जगत्पूज्यो जगद्गुरुः | इति श्रीमच्छंकराचार्यसर्वलोकगुरोः परम् || २४|| १०६) ॐ व्याख्यसिंहासनाधीशाय नमः best. १०७) ॐ जगत्पूज्याय नमः १०८) ॐ जगद्गुरवे नमः नाम्नामष्टोत्तरशतं भुक्तिमुक्तिफलप्रदं | त्रिसन्ध्यां यः पठेद्भक्त्या सर्वान्कामानवाप्नुयात् ||
।।श्रीमद्शंकराचार्य अष्टोत्तरशत् नामावलि सम्पूर्ण ।।